ज़ुल्फ़ तहरीर-ए-परेशान-ए-तक़ाज़ा है मगर — मिर्ज़ा ग़ालिब

ज़ुल्फ़ तहरीर-ए-परेशान-ए-तक़ाज़ा है मगर शाना-साँ मू-ब-ज़बाँ ख़ामा-ए-मानी माँगे

“Her locks are a scattered script of entreaty, yet Like a comb, hair by hair, they demand the pen of meaning.”

— मिर्ज़ा ग़ालिब

अर्थ

उसकी ज़ुल्फ़ें एक बिखरी हुई इल्तिजा की तहरीर सी हैं, लेकिन कंघी की तरह हर एक बाल मानी की क़लम की माँग करता है।

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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