नफ़स-ए-क़ैस कि है चश्म-ओ-चराग़-ए-सहरा
गर नहीं शम-ए-सियह-ख़ाना-ए-लैली न सही
“The very breath of Qais, the desert's guiding light, If not Laila's dark home's lamp, then it's alright.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
क़ैस की साँस, जो रेगिस्तान की आँख और चिराग़ है, अगर वह लैला के अँधेरे घर की शमा नहीं है, तो भी ठीक है।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
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