वो भी दिन हो कि उस सितमगर से — मिर्ज़ा ग़ालिब

वो भी दिन हो कि उस सितमगर से नाज़ खींचूँ बजाए हसरत-ए-नाज़

“Oh, may that day arrive, when from that tyrant's side,I draw forth pride, where now just longings reside.”

— मिर्ज़ा ग़ालिब

अर्थ

कवि कामना करता है कि वह दिन आए जब वह उस निर्दयी प्रेमी के सामने अपना गर्व (नाज़) प्रकट कर सके, बजाय इसके कि केवल नाज़ की लालसा (हसरत) में रहे।

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

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