ज़हर मिलता ही नहीं मुझ को सितमगर वर्ना क्या क़सम है तिरे मिलने की कि खा भी न सकूँ

“Poison is simply nowhere to be found, O cruel tormentor, or else / is an oath upon our meeting so impossible a thing that I could not even swallow it?”

— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

ऐ सितमगर, मुझे ज़हर ही नहीं मिलता वरना क्या तुझसे मिलने की ऐसी कोई क़सम है जिसे मैं खा भी न सकूँ?

विस्तार

यहाँ शायर ने 'ज़हर खाना' और 'क़सम खाना' के मुहावरे का बड़ा ही खूबसूरत और चुटीला मेल दिखाया है। वह अपने बेपरवाह महबूब से शिकवा करते हुए कहता है कि मुझे तो बस ज़हर नहीं मिल पा रहा, वरना मैं कब का खा लेता—आख़िर यह तुम्हारे दीदार की कोई ऐसी मुश्किल क़सम तो नहीं जिसे खाया न जा सके। इस तीखे तंज़ और हल्की मुस्कान के पीछे एक गहरा दर्द छुपा है, जहाँ आशिक़ के लिए जान देना महबूब के मिलने की आस से भी आसान बन चुका है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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