ग़ज़ल
लो हम मरीज़-ए-इश्क़ के बीमार-दार हैं
لو ہم مریض عشق کے بیمار دار ہیں
यह ग़ज़ल प्रेम के उस असाध्य दर्द को रेखांकित करती है, जिसका कोई उपचार किसी मसीहा के पास भी नहीं है। इसमें शायर ने इश्क़ की लाचारी, गहरी तड़प और प्रेम-रोग की तीखी सच्चाई को व्यंग्य और समर्पण के मिले-जुले भाव से बयां किया है।
Source: rekhta · HI
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लो हम मरीज़-ए-इश्क़ के बीमार-दार हैं
अच्छा अगर न हो तो मसीहा का क्या इलाज
लीजिए, हम इश्क़ के मरीज़ की तीमारदारी कर रहे हैं; लेकिन अगर यह मरीज़ ठीक ही न हो, तो फिर मसीहा के पास भी इसका क्या इलाज है?
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