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फ़राग़त किस क़दर रहती मुझे तश्वीश-ए-मरहम से बहम गर सुल्ह करते पारा-हा-ए-दिल नमक-दाँ पर

How great the ease I'd find from balm's anxious thought, if my heart's fragments made peace with the salt-shaker's lot.

मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

मुझे मरहम की चिंता से कितनी फ़राग़त मिलती, अगर मेरे दिल के टुकड़े नमक-दाँ से सुलह कर लेते।

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

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