ग़ज़ल
कभी नेकी भी उस के जी में गर आ जाए है मुझ से
کبھی نیکی بھی اس کے جی میں گر آ جائے ہے مجھ سے
यह ग़ज़ल एकतरफ़ा प्रेम की गहरी जटिलताओं को दर्शाती है, जहाँ प्रिय अपने कठोर स्वभाव के बावजूद कभी-कभी दया या शर्मिंदगी महसूस करता है। प्रेमी स्वयं को उनकी ओर अटूट रूप से आकर्षित पाता है, चाहे वह उनसे दूर रहने की कितनी भी कोशिश करे। यह कविता प्रिय के अविश्वास और प्रेमी की अपनी कमज़ोरी के कारण उत्पन्न भावनात्मक गतिरोध को उजागर करती है, जिससे सीधा संवाद असंभव हो जाता है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
कभी नेकी भी उस के जी में गर आ जाए है मुझ से
जफ़ाएँ कर के अपनी याद शरमा जाए है मुझ से
यदि कभी उनके मन में मेरे लिए कोई अच्छा विचार आता है, तो वे अपनी की गई क्रूरताओं को याद करके शर्मिंदा हो जाते हैं।
2
ख़ुदाया जज़्बा-ए-दिल की मगर तासीर उल्टी है
कि जितना खींचता हूँ और खिंचता जाए है मुझ से
हे ईश्वर, मेरे दिल के जज़्बे का असर उल्टा है; क्योंकि मैं जितना इसे खींचता हूँ, यह उतना ही मुझसे दूर खिंचता जाता है।
3
वो बद-ख़ू और मेरी दास्तान-ए-इश्क़ तूलानी
इबारत मुख़्तसर क़ासिद भी घबरा जाए है मुझ से
वह बदमिज़ाज है और मेरी प्रेम कहानी बहुत लंबी है। संदेश भले ही छोटा हो, लेकिन क़ासिद भी मुझसे घबरा जाता है।
4
उधर वो बद-गुमानी है इधर ये ना-तवानी है
न पूछा जाए है उस से न बोला जाए है मुझ से
उधर उसकी बदगुमानी है और इधर मेरी कमज़ोरी है। न वह कुछ पूछ पाती है और न मैं कुछ कह पाता हूँ।
5
सँभलने दे मुझे ऐ ना-उम्मीदी क्या क़यामत है
कि दामान-ए-ख़याल-ए-यार छूटा जाए है मुझ से
ए निराशा, मुझे संभलने दे। यह कैसी क़यामत है कि मेरे प्रिय के ख़्याल का दामन मेरे हाथ से छूटता जा रहा है।
6
तकल्लुफ़ बरतरफ़ नज़्ज़ारगी में भी सही लेकिन
वो देखा जाए कब ये ज़ुल्म देखा जाए है मुझ से
तकल्लुफ़ को अलग रखिये; भले ही सिर्फ़ दूर से देखना ही सही माना जाए, लेकिन वह सच्चा दीदार कब होगा? मैं इस ज़ुल्म को कब तक बर्दाश्त करूँगा?
7
हुए हैं पाँव ही पहले नबर्द-ए-इश्क़ में ज़ख़्मी
न भागा जाए है मुझ से न ठहरा जाए है मुझ से
इश्क़ की जंग में मेरे पाँव पहले ही ज़ख़्मी हो गए हैं। इस कारण अब मैं न तो भाग सकता हूँ और न ही ठहर सकता हूँ।
8
क़यामत है कि होवे मुद्दई का हम-सफ़र 'ग़ालिब'
वो काफ़िर जो ख़ुदा को भी न सौंपा जाए है मुझ से
यह क़यामत है, 'ग़ालिब', कि मेरा प्रतिद्वंद्वी उस बेवफ़ा का हमसफ़र बन जाए, जिसे मैं ख़ुदा के भरोसे भी नहीं छोड़ सकता।
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
