मौज-ए-ख़ूँ सर से गुज़र ही क्यूँ न जाए — मिर्ज़ा ग़ालिब

मौज-ए-ख़ूँ सर से गुज़र ही क्यूँ न जाए आस्तान-ए-यार से उठ जाएँ क्या

“Let a wave of blood pass over my head, why should I rise from the beloved's threshold?”

— मिर्ज़ा ग़ालिब

अर्थ

भले ही खून की लहर मेरे सिर से गुज़र जाए, मैं प्रियतम के दरवाज़े से क्यों उठूँ? यह अत्यधिक खतरे के बावजूद अटूट भक्ति व्यक्त करता है।

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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