ग़ज़ल
हम से खुल जाओ ब-वक़्त-ए-मय-परस्ती एक दिन
ہم سے کھل جاؤ ب-وقتِ مے پرستی ایک دن
यह ग़ज़ल जिसका शीर्षक "हम से खुल जाओ ब-वक़्त-ए-मय-परस्ती एक दिन" है, अंतरंगता, सांसारिक अभिमान की क्षणभंगुरता और जीवन की जटिलताओं को स्वीकार करने जैसे विषयों पर प्रकाश डालती है। शायर महबूब से अपने दिल की बात कहने का आग्रह करता है, वहीं यह भी दर्शाता है कि दुनिया की हर बुलंदी को एक दिन ज़वाल देखना है। यह ग़ज़ल दुख को भी एक नियामत मानने का मार्मिक संदेश देती है, क्योंकि एक दिन "हस्ती का साज़" खामोश हो जाएगा।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
हम से खुल जाओ ब-वक़्त-ए-मय-परस्ती एक दिन
वर्ना हम छेड़ेंगे रख कर उज़्र-ए-मस्ती एक दिन
किसी दिन शराब पीते समय हमसे अपने दिल की बात कह दो। नहीं तो, एक दिन हम नशे का बहाना बनाकर तुम्हें छेड़ेंगे।
2
ग़र्रा-ए-औज-ए-बिना-ए-आलम-ए-इमकाँ न हो
इस बुलंदी के नसीबों में है पस्ती एक दिन
इस संभावना के संसार की नींव की ऊँचाई पर घमंड मत करो। इस बुलंदी के नसीब में एक दिन गिरावट अवश्य है।
3
क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हाँ
रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन
हम उधार की शराब पीते थे, लेकिन यह भी जानते थे कि हमारी यह गरीबी में मस्ती एक दिन ज़रूर रंग लाएगी और अपना असर दिखाएगी।
4
नग़्मा-हा-ए-ग़म को भी ऐ दिल ग़नीमत जानिए
बे-सदा हो जाएगा ये साज़-ए-हस्ती एक दिन
ऐ दिल, दुख के गीतों को भी अनमोल समझो, क्योंकि एक दिन जीवन का यह संगीत शांत हो जाएगा।
5
धौल-धप्पा उस सरापा-नाज़ का शेवा नहीं
हम ही कर बैठे थे 'ग़ालिब' पेश-दस्ती एक दिन
उस सरापा-नाज़ का स्वभाव धौल-धप्पा करना नहीं है; ग़ालिब, हम ही थे जिन्होंने एक दिन पहल की थी।
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