ग़ज़ल

है किस क़दर हलाक-ए-फ़रेब-ए-वफ़ा-ए-गुल

ہے کس قدر ہلاکِ فریبِ وفاۓ گل
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 11 shers· radif: आश्ना-ए-गुल

यह ग़ज़ल गुलाब की कथित वफ़ादारी के धोखे से होने वाली तबाही पर मार्मिक सवाल उठाती है। यह बुलबुल की वफ़ादारी पर गुलाब के व्यंग्यपूर्ण उपहास को दर्शाती है, और उन लोगों के लिए शोक व्यक्त करती है जो उसकी रंगीन सुंदरता के भ्रम में पड़कर नष्ट हो जाते हैं। यह ग़ज़ल झूठी उम्मीद जगाने वाली सुंदरता की विनाशकारी और मनमोहक प्रकृति को उजागर करती है, जो हवा के उसके मोहक जाल से मुक्त होने के विपरीत है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
है किस क़दर हलाक-ए-फ़रेब-ए-वफ़ा-ए-गुल बुलबुल के कारोबार पे हैं ख़ंदा-हा-ए-गुल
फूल की कपटपूर्ण वफ़ा से कोई कितना बर्बाद होता है, स्वयं फूल ही बुलबुल के समस्त प्रयासों पर हँसते हैं।
2
आज़ादी-ए-नसीम मुबारक कि हर तरफ़ टूटे पड़े हैं हल्क़ा-ए-दाम-ए-हवा-ए-गुल
हवा की आज़ादी मुबारक हो, क्योंकि हर तरफ़ गुलाब के मोहक जाल के छल्ले टूटे पड़े हैं।
3
जो था सो मौज-ए-रंग के धोके में मर गया ऐ वाए नाला-ए-लब-ए-ख़ूनीं-नवा-ए-गुल
जो कुछ भी मौजूद था, वह रंग की लहर के धोखे में मिट गया। अफ़सोस, उस रक्त-रंजित होंठों वाले बोलने वाले गुलाब के विलाप पर!
4
ख़ुश-हाल उस हरीफ़-ए-सियह-मस्त का कि जो रखता हो मिस्ल-ए-साया-ए-गुल सर-ब-पा-ए-गुल
धन्य है वह गहरा भावुक प्रतिद्वंद्वी जो, फूल की परछाईं की तरह, अपने सिर को फूल के चरणों में रखता है।
5
ईजाद करती है उसे तेरे लिए बहार मेरा रक़ीब है नफ़स-ए-इत्र-सा-ए-गुल
बहार उसे तुम्हारे लिए ईजाद करती है; मेरा रक़ीब गुलाब की खुशबूदार साँस है।
6
शर्मिंदा रखते हैं मुझे बाद-ए-बहार से मीना-ए-बे-शराब ओ दिल-ए-बे-हवा-ए-गुल
शराब से खाली मेरी सुराही और फूलों की चाहत से रहित मेरा दिल मुझे बसंत की हवा से शर्मिंदा रखते हैं।
7
सतवत से तेरे जल्वा-ए-हुस्न-ए-ग़ुयूर की ख़ूँ है मिरी निगाह में रंग-ए-अदा-ए-गुल
तुम्हारी ग़यूर ख़ूबसूरती के शानदार जलवे के कारण, मेरी निगाह में गुलाब का मनमोहक रंग केवल ख़ून जैसा दिखता है।
8
तेरे ही जल्वे का है ये धोका कि आज तक बे-इख़्तियार दौड़े है गुल दर-क़फ़ा-ए-गुल
यह आपके ही प्रताप का भ्रम है कि आज तक फूल बेकाबू होकर एक-दूसरे के पीछे दौड़ते हैं।
9
'ग़ालिब' मुझे है उस से हम-आग़ोशी आरज़ू जिस का ख़याल है गुल-ए-जेब-ए-क़बा-ए-गुल
ग़ालिब, मुझे उस महबूब से गले मिलने की आरज़ू है, जिसका ख़याल ऐसा है जैसे किसी फूल की क़बा की जेब में रखा हुआ फूल।
10
दीवानगाँ का चारा फ़रोग़-ए-बहार है है शाख़-ए-गुल में पंजा-ए-ख़ूबाँ बजाए गुल
दीवानों का सहारा बसंत की शोभा है। फूल की डाल पर फूलों की जगह महबूब की उंगलियाँ हैं।
11
मिज़्गाँ तलक रसाई-ए-लख़्त-ए-जिगर कहाँ ऐ वाए गर निगाह न हो आश्ना-ए-गुल
हृदय का अंश पलकों तक कैसे पहुँच सकता है? अफ़सोस, यदि दृष्टि गुलाब से परिचित न हो।
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