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फ़ारिग़ मुझे न जान कि मानिंद-ए-सुब्ह-ओ-मेहर
है दाग़-ए-'इश्क़ ज़ीनत-ए-जेब-ए-कफ़न हुनूज़

Do not deem me free, for just as dawn and sun are marked,The wound of love still adorns my shroud's breast, even now.

मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

मुझे फ़ारिग़ न जानो, क्योंकि सुबह और सूरज की तरह, प्रेम का दाग़ अभी भी मेरे कफ़न की जेब की शोभा है।

विस्तार

यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।

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