रहे है यूँ गह-ओ-बे-गह कि कू-ए-दोस्त को अब
अगर न कहिए कि दुश्मन का घर है क्या कहिए
“I dwell there, sometimes welcome, sometimes not, at the beloved's lane, to such a degree. If I don't call it the enemy's abode, then what else can it be?”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
मैं महबूब की गली में इस तरह रहता हूँ कि कभी जगह मिलती है और कभी नहीं, अगर अब इसे दुश्मन का घर न कहूँ तो और क्या कहूँ।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
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