ग़ज़ल
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ
دل ہی تو ہے نہ سنگ و خشت درد سے بھر نہ آئے کیوں
यह ग़ज़ल दिल की दर्द सहने की क्षमता पर मार्मिक प्रश्न उठाती है, कहती है कि दिल पत्थर नहीं, और इसीलिए सताए जाने पर दर्द से भर क्यों न जाए। यह प्रेमी की निराश्रित और संवेदनशील अवस्था का चित्रण करती है, जो बिना किसी ठिकाने के राह पर बैठा है। शेर महबूब की चकाचौंध कर देने वाली और घातक सुंदरता का भी बखान करते हैं, जो इतनी तीव्र है कि निगाहों को जला देती है, परदे की ज़रूरत नहीं और यहाँ तक कि प्रतिबिंब भी सहना मुश्किल है।
Source: rekhta · HI
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1
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ
रोएँगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यूँ
यह दिल ही तो है, पत्थर या ईंट नहीं; तो यह दर्द से क्यों न भरे? हम हज़ार बार रोएँगे; कोई हमें क्यों सताए?
2
दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आस्ताँ नहीं
बैठे हैं रहगुज़र पे हम ग़ैर हमें उठाए क्यूँ
न तो कोई मंदिर है, न काबा, न कोई दरवाज़ा है और न कोई चौखट हमारी है। हम तो राह पर बैठे हैं, तो कोई अजनबी हमें क्यों उठाएगा?
3
जब वो जमाल-ए-दिल-फ़रोज़ सूरत-ए-मेहर-ए-नीमरोज़
आप ही हो नज़ारा-सोज़ पर्दे में मुँह छुपाए क्यूँ
जब वह दिल को रोशन करने वाली सुंदरता, दोपहर के सूरज के रूप जैसी है, और खुद ही इतनी तेज़ है कि देखने वाले को झुलसा दे, तो वह परदे में अपना मुँह क्यों छिपाए?
4
दश्ना-ए-ग़म्ज़ा जाँ-सिताँ नावक-ए-नाज़ बे-पनाह
तेरा ही अक्स-ए-रुख़ सही सामने तेरे आए क्यूँ
तुम्हारी नज़र का खंजर जान लेने वाला है और तुम्हारी अदाओं का तीर बेपनाह है। ऐसे में, भले ही यह तुम्हारे चेहरे की अपनी ही परछाई हो, तुम्हारे सामने आने की हिम्मत क्यों करे?
5
क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ
जीवन की कैद और दुख के बंधन असल में दोनों एक ही हैं। आदमी मौत से पहले दुख से मुक्ति क्यों पाए?
6
हुस्न और उस पे हुस्न-ए-ज़न रह गई बुल-हवस की शर्म
अपने पे ए'तिमाद है ग़ैर को आज़माए क्यूँ
ख़ूबसूरती और उस पर उसका अपना अंदाज़ या ए'तिमाद देखकर लालची व्यक्ति शर्मिंदा हो गया। मुझे खुद पर पूरा भरोसा है, तो मैं दूसरों को क्यों आज़माऊँ?
7
वाँ वो ग़ुरूर-ए-इज्ज़-ओ-नाज़ याँ ये हिजाब-ए-पास-ए-वज़अ
राह में हम मिलें कहाँ बज़्म में वो बुलाए क्यूँ
वहाँ उनमें विनम्रता और नज़ाकत का अभिमान है, और यहाँ मुझमें आत्म-सम्मान का परदा है। ऐसे में हम रास्ते में कहाँ मिल सकते हैं, और वे मुझे अपनी महफिल में क्यों बुलाएँगे?
8
हाँ वो नहीं ख़ुदा-परस्त जाओ वो बेवफ़ा सही
जिस को हो दीन ओ दिल अज़ीज़ उस की गली में जाए क्यूँ
हाँ, वह ख़ुदा-परस्त नहीं है; जाओ, भले ही वह बेवफ़ा हो। लेकिन जिसे अपना धर्म और दिल प्यारा हो, वह उसकी गली में क्यों जाएगा?
9
'ग़ालिब'-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बंद हैं
रोइए ज़ार ज़ार क्या कीजिए हाए हाए क्यूँ
'ग़ालिब'-ए-ख़स्ता के बिना कौन से काम रुके हुए हैं? क्यों इतना फूट-फूटकर रोते हो और क्यों हाय-हाय करते हो?
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