ग़ज़ल

देखना क़िस्मत कि आप अपने पे रश्क आ जाए है

دیکھنا قسمت کہ آپ اپنے پے رشک آ جائے ہے
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 10 shers· radif: है

यह ग़ज़ल एक प्रेमी के गहन कष्ट को दर्शाती है, जो अपनी किस्मत पर इस हद तक अफसोस करता है कि उसे अपनी ही हालत पर रश्क आता है। इश्क़ की प्रबलता दिल को पिघला देती है, जबकि महबूब की हया या बेरुख़ी प्रेमी की लगातार आहों और गहरी बेचैनी को और बढ़ा देती है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
देखना क़िस्मत कि आप अपने पे रश्क आ जाए है मैं उसे देखूँ भला कब मुझ से देखा जाए है
मेरी किस्मत तो देखो कि मैं खुद अपने आप पर रश्क करने लगता हूँ। मैं भला उसे कैसे देखूँ जब मुझसे उसे देखा ही नहीं जाता है।
2
हाथ धो दिल से यही गर्मी गर अंदेशे में है आबगीना तुन्दि-ए-सहबा से पिघला जाए है
अपने दिल से हाथ धो ले, अगर तुम्हारे ख्यालों में यही तीव्रता है। शराब की तेज़ी से शराब का प्याला ही पिघलता जा रहा है।
3
ग़ैर को या रब वो क्यूँकर मन-ए-गुस्ताख़ी करे गर हया भी उस को आती है तो शरमा जाए है
हे प्रभु, वह किसी और की गुस्ताख़ी को कैसे रोक सकती है? अगर उसे थोड़ी सी भी शर्म आती है, तो वह पूरी तरह से शरमा जाती है।
4
शौक़ को ये लत कि हर दम नाला खींचे जाइए दिल की वो हालत कि दम लेने से घबरा जाए है
शौक़ को यह आदत हो गई है कि वह हर पल आहें भरता रहे। दिल की हालत यह है कि उसे सांस लेने से भी घबराहट होती है।
5
दूर चश्म-ए-बद तिरी बज़्म-ए-तरब से वाह वाह नग़्मा हो जाता है वाँ गर नाला मेरा जाए है
आपकी खुशियों भरी महफिल से बुरी नज़र दूर रहे, वाह! यदि मेरा दुख भरा रोना वहाँ पहुँच भी जाए, तो वह एक गीत बन जाता है।
6
गरचे है तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल पर्दा-दार-ए-राज़-ए-इश्क़ पर हम ऐसे खोए जाते हैं कि वो पा जाए है
हालांकि बेरुखी का अंदाज़ इश्क़ के राज़ को छुपाता है, पर हम ऐसे खो जाते हैं कि वो राज़ ज़ाहिर हो जाता है।
7
उस की बज़्म-आराइयाँ सुन कर दिल-ए-रंजूर याँ मिस्ल-ए-नक़्श-ए-मुद्दआ-ए-ग़ैर बैठा जाए है
उसकी महफ़िल की सजावटें सुनकर, यह दुखी दिल यहाँ किसी प्रतिद्वंद्वी की मुराद के नक़्श की तरह बैठा है।
8
हो के आशिक़ वो परी-रुख़ और नाज़ुक बन गया रंग खुलता जाए है जितना कि उड़ता जाए है
वह परी जैसे चेहरे वाला प्रियतम, आशिक़ होकर और नाज़ुक बन गया। उसका रंग जितना उड़ता जाता है, उतना ही खुलता जाता है।
9
नक़्श को उस के मुसव्विर पर भी क्या क्या नाज़ हैं खींचता है जिस क़दर उतना ही खिंचता जाए है
नक़्श को अपने मुसव्विर पर भी बहुत नाज़ हैं। मुसव्विर उसे जितना खींचता है, वह उतना ही खिंचता चला जाता है।
10
साया मेरा मुझ से मिस्ल-ए-दूद भागे है 'असद' पास मुझ आतिश-ब-जाँ के किस से ठहरा जाए है
मेरा साया भी मुझसे धुएँ की तरह भागता है, असद। मुझ आग-भरी जान के पास कौन ठहर सकता है?
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