न हुई हम से रक़म हैरत-ए-ख़त्त-ए-रुख़-ए-यार
सफ़्हा-ए-आइना जौलाँ-गह-ए-तूती न हुआ
“I couldn't write the wonder of the beloved's facial trace,The mirror's page itself became no parrot's playful space.”
— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ
मैं यार के चेहरे के ख़त की हैरत को लिख न सका। दर्पण का सफ़्हा (पृष्ठ) तोते के खेलने की जगह न बन सका।
विस्तार
यह सुंदर शेर गहरी भावनाओं और दर्शन की खोज करता है। ग़ालिब ने बेहतरीन तरीके से प्रेम, लालसा और आध्यात्मिक खोज के विषयों को जोड़ा है, जो शताब्दियों से प्रेरणा देता है।
