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ग़ज़ल

बिसात-ए-इज्ज़ में था एक दिल यक क़तरा ख़ूँ वो भी

بساطِ عجز میں تھا ایک دل یک قطرہ خوں وہ بھی
मिर्ज़ा ग़ालिब· Ghazal· 9 shers· radif: भी

यह ग़ज़ल अत्यधिक लाचारी और गहरे दुख का मार्मिक चित्रण करती है, जहाँ हृदय को केवल एक नाज़ुक रक्त की बूंद के रूप में दर्शाया गया है जो लगातार शोक से बोझिल है। यह अधूरी इच्छाओं की गहराई और इस कड़वी विडंबना को दर्शाती है कि दर्द व्यक्त करने से भी आंतरिक पीड़ा और बढ़ जाती है, जिससे निराशा से कोई मुक्ति नहीं मिलती।

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1
बिसात-ए-इज्ज़ में था एक दिल यक क़तरा ख़ूँ वो भी सो रहता है ब-अंदाज़-ए-चकीदन सर-निगूँ वो भी
असहायता के संसार में एक दिल था, जो एक ख़ून की बूँद के समान था। वह भी आँसू टपकने के अंदाज़ में, सिर झुकाए हुए रहता है।
2
रहे उस शोख़ से आज़ुर्दा हम चंदे तकल्लुफ़ से तकल्लुफ़ बरतरफ़ था एक अंदाज़-ए-जुनूँ वो भी
हम उस शोख़ से कुछ समय तक शिष्टाचारवश रूठे रहे। पर सच कहूँ तो, वह रूठना भी हमारी दीवानगी का ही एक अंदाज़ था।
3
ख़याल-ए-मर्ग कब तस्कीं दिल-ए-आज़ुर्दा को बख़्शे मिरे दाम-ए-तमन्ना में है इक सैद-ए-ज़बूँ वो भी
मृत्यु का विचार मेरे दुखी हृदय को कब शांति देगा? वह (मृत्यु) भी, एक कमज़ोर शिकार, मेरी इच्छाओं के जाल में फंसा हुआ है।
4
न करता काश नाला मुझ को क्या मालूम था हमदम कि होगा बाइस-ए-अफ़्ज़ाइश-ए-दर्द-ए-दरूँ वो भी
काश मैं रोता नहीं, ऐ दोस्त, मुझे क्या पता था कि यह भी मेरे अंदरूनी दर्द को और बढ़ा देगा।
5
न इतना बुर्रिश-ए-तेग़-ए-जफ़ा पर नाज़ फ़रमाओ मिरे दरिया-ए-बे-ताबी में है इक मौज-ए-ख़ूँ वो भी
तुम जुल्म की तलवार की धार पर इतना घमंड मत करो। मेरी बेचैनी के दरिया में खून की एक लहर भी है।
6
मय-ए-इशरत की ख़्वाहिश साक़ी-ए-गर्दूं से क्या कीजे लिए बैठा है इक दो चार जाम-ए-वाज़-गूँ वो भी
स्वर्ग के साक़ी से आनंद की शराब की इच्छा क्यों करें? वह खुद भी कुछ दुख के प्याले लेकर बैठा है।
7
मिरे दिल में है 'ग़ालिब' शौक़-ए-वस्ल ओ शिकवा-ए-हिज्राँ ख़ुदा वो दिन करे जो उस से मैं ये भी कहूँ वो भी
ऐ ग़ालिब, मेरे दिल में मिलन की इच्छा और जुदाई की शिकायत दोनों हैं। खुदा वो दिन लाए जब मैं उससे ये दोनों बातें कह सकूँ।
8
मुझे मालूम है जो तू ने मेरे हक़ में सोचा है कहीं हो जाए जल्द ऐ गर्दिश-ए-गर्दून-ए-दूँ वो भी
मुझे पता है कि तूने मेरे बारे में क्या सोचा है। ऐ नीच आसमान की चाल, काश वह भी जल्द हो जाए।
9
नज़र राहत पे मेरी कर न वा'दा शब के आने का कि मेरी ख़्वाब-बंदी के लिए होगा फ़ुसूँ वो भी
मेरी आराम को मत देखो, और रात के आने का वादा भी मत करो, क्योंकि वह भी मेरी नींद को रोकने के लिए एक जादू बन जाएगा।
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