ग़म-ए-ज़माना ने झाड़ी नशात-ए-इश्क़ की मस्ती वगरना हम भी उठाते थे अज़्ज़त-ए-अलम आगे

“The sorrows of the world have purged the drunken bliss of love; / Else we too once were wont to taste the ecstasy of grief.”

— मिर्ज़ा ग़ालिब
अर्थ

दुनिया के ग़मों ने इश्क़ की मस्ती और ख़ुशी को ख़त्म कर दिया है, वरना पहले हम भी इश्क़ के दर्द का लुत्फ़ उठाया करते थे।

विस्तार

शायर यहाँ ज़िंदगी की कड़वी सच्चाइयों और रोज़मर्रा की मुश्किलों का दर्द बयां कर रहे हैं, जिसने इश्क़ के नशे और उस नाज़ुक सुरूर को पूरी तरह झाड़ फेंका है। एक वक़्त था जब इश्क़ का दर्द भी मीठा लगता था और दिल उस 'लज़्ज़त-ए-अलम' यानी ग़म के लुत्फ़ में डूबकर सुकून पाता था। मगर दुनियावी उलझनों ने ज़िंदगी को इतना बेरहम बना दिया है कि अब महबूब के ग़म में रोने की फ़ुर्सत और नज़ाकत भी छिन गई है।

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