ધન્ય ધન્ય એમ કહી એવે શુભ સમે રે, દીલથી દે છે દુવા દલપતરામ રે, બીજે ક્યાંઈ...

“"Blessed, blessed," saying thus at such an auspicious time, Dalpatram from his heart gives blessings, (and nowhere else)...”

— दलपतराम
अर्थ

"धन्य, धन्य" ऐसा कहकर ऐसे शुभ समय में, दलपतराम अपने दिल से दुआएँ देते हैं, (और कहीं नहीं)।

विस्तार

यह दोहा एक सुंदर भावना व्यक्त करता है। इसमें कवि दलपतराम कहते हैं कि ऐसे शुभ और विशेष अवसर पर वे अपने हृदय से आशीर्वाद देते हैं। "धन्य धन्य" का प्रयोग शायद कृतज्ञता व्यक्त करने या किसी सकारात्मक अभिवादन के जवाब में किया गया है। कवि अपने दिल की गहराइयों से शुभकामनाएँ देते हैं। "बीजे क્યાંई" (कहीं और) यह दर्शाता है कि उनकी शुभकामनाएँ किसी एक स्थान तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह एक सार्वभौमिक या विनम्र भाव है। यह सद्भावना की एक सरल लेकिन शक्तिशाली घोषणा है, जो ईमानदारी और सकारात्मक इरादों के प्रसार पर जोर देती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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