अदम की जो हक़ीक़त है वो पूछो अहल-ए-हस्ती से — दाग़ देहलवी
“Ask those who dwell in being of non-existence and its trace; a traveler learns the destination only upon reaching that place.”
अर्थ
ग़ैर-मौजूदगी या मौत की असल हक़ीक़त ज़िंदा लोगों से पूछनी चाहिए, क्योंकि मुसाफ़िर को अपनी मंज़िल का पता सिर्फ़ मंज़िल पर पहुँच कर ही चलता है।
विस्तार
शायर यहाँ ज़िंदगी और मौत (अदम यानी शून्य) के गहरे रिश्ते को एक खूबसूरत अंदाज़ में बयां कर रहा है। जो लोग इस दुनिया में जी रहे हैं, वही दरअसल उस पार की हक़ीक़त और उसके खालीपन को शिद्दत से महसूस करते हैं। यह ठीक वैसे ही है जैसे रास्ते पर चलता हुआ कोई मुसाफ़िर अपनी मंज़िल का तसव्वुर करता है, मगर उस मंज़िल का सच्चा अहसास तो सिर्फ वहीं पहुँचकर ही मुमकिन होता है।
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