ग़ज़ल
ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया
خاطر سے یا لحاظ سے میں مان تو گیا
यह ग़ज़ल महबूब के झूठे वादों, फ़रेब और एहसान-फ़रामोशी पर शायर का एक चुटीला और दर्दभरा तंज़ पेश करती है। आशिक़ महबूब के मान-सम्मान के लिए उसकी बात मान तो लेता है, लेकिन उसके खोए हुए ईमान और बेरुख़ी पर कटाक्ष करना नहीं भूलता।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
अभी गीत नहीं
1
ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया
झूटी क़सम से आप का ईमान तो गया
2
दिल ले के मुफ़्त कहते हैं कुछ काम का नहीं
उल्टी शिकायतें हुईं एहसान तो गया
3
डरता हूँ देख कर दिल-ए-बे-आरज़ू को मैं
सुनसान घर ये क्यूँ न हो मेहमान तो गया
4
क्या आए राहत आई जो कुंज-ए-मज़ार में
वो वलवला वो शौक़ वो अरमान तो गया
5
देखा है बुत-कदे में जो ऐ शैख़ कुछ न पूछ
ईमान की तो ये है कि ईमान तो गया
6
इफ़्शा-ए-राज़-ए-इश्क़ में गो ज़िल्लतें हुईं
लेकिन उसे जता तो दिया जान तो गया
7
गो नामा-बर से ख़ुश न हुआ पर हज़ार शुक्र
मुझ को वो मेरे नाम से पहचान तो गया
8
बज़्म-ए-अदू में सूरत-ए-परवाना दिल मिरा
गो रश्क से जला तिरे क़ुर्बान तो गया
9
होश ओ हवास ओ ताब ओ तवाँ 'दाग़' जा चुके
अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
