जौफ़-ए-फ़लक में ख़ाक भी लज़्ज़त नहीं रही जी चाहता है तेरी जफ़ाएँ उठाएँ हम

“Within the hollow vault of sky, no taste of joy remains; my heart longs once again to bear your cruelties and pains.”

— दाग़ देहलवी
अर्थ

आसमान के इस ख़ालीपन में अब ज़रा भी मज़ा नहीं रहा, दिल चाहता है कि हम फिर से तुम्हारे ज़ुल्म-ओ-सितम बर्दाश्त करें।

विस्तार

शायर कहता है कि इस विशाल आसमान के खोखलेपन या जन्नत की बेजान शांति में ज़रा भी मज़ा नहीं रह गया है। वहाँ सब कुछ इतना खामोश और बेअसर है कि दिल अब किसी ज़िंदा अहसास के लिए तड़प रहा है। इश्क़ की ख़ूबसूरती यही है कि महबूब के दिए ज़ुल्म-ओ-सितम भी इस नीरस सुकून से कहीं बेहतर लगते हैं, क्योंकि उस दर्द में कम से कम मोहब्बत की तपिश तो महसूस होती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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