“What if in days gone by, 'Zafar' bore the obligation of reason? And what of it if now he yields once more to the entreaties of contrivance?”
अगर पहले 'ज़फ़र' ने अक़्ल का अहसान उठा भी लिया तो क्या हुआ, और अगर अब दोबारा किसी तदबीर या उपाय का अहसान सह लिया तो इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है?
इस शेर में ज़फ़र ज़िंदगी और तक़दीर के सामने इंसान की अक़्ल और समझदारी की बेबसी पर बात कर रहे हैं। वे कहते हैं कि अगर पहले हमने अक़्ल की मानी और उसके अहसान तले दबे रहे, और अब फिर से हालात सुधारने के लिए कोई तदबीर या युक्ति निकाल भी ली, तो उससे क्या हासिल हो जाएगा? यह शेर दरअसल दिल की बेबसी और क़िस्मत के फैसलों के आगे इंसानी कोशिशों की लाचारी का एक बेहद संजीदा इज़हार है।
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