ग़ज़ल

क्या कुछ न किया और हैं क्या कुछ नहीं करते

کیا کچھ نہ کیا اور ہیں کیا کچھ نہیں کرتے
बहादुर शाह ज़फ़र· Ghazal· 7 shers· radif: कुछ नहीं करते

यह ग़ज़ल इश्क़ के ग़म, बेबसी और अनन्य समर्पण के भाव को उजागर करती है। इसमें आशिक के दिल के दर्द का ऐसा चित्रण है जिसका इलाज दुनियावी तबीबों के पास नहीं, बल्कि केवल उसके महबूब की नज़र-ए-इनायत में है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
क्या कुछ न किया और हैं क्या कुछ नहीं करते कुछ करते हैं ऐसा ब-ख़ुदा कुछ नहीं करते
2
अपने मरज़-ए-ग़म का हकीम और कोई है हम और तबीबों की दवा कुछ नहीं करते
3
मालूम नहीं हम से हिजाब उन को है कैसा औरों से तो वो शर्म ओ हया कुछ नहीं करते
4
गो करते हैं ज़ाहिर को सफ़ा अहल-ए-कुदूरत पर दिल को नहीं करते सफ़ा कुछ नहीं करते
5
वो दिलबरी अब तक मिरी कुछ करते हैं लेकिन तासीर तिरे नाले दिला कुछ नहीं करते
6
दिल हम ने दिया था तुझे उम्मीद-ए-वफ़ा पर तुम हम से नहीं करते वफ़ा कुछ नहीं करते
7
करते हैं वो इस तरह 'ज़फ़र' दिल पे जफ़ाएँ ज़ाहिर में ये जानो कि जफ़ा कुछ नहीं करते
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क्या कुछ न किया और हैं क्या कुछ नहीं करते | Sukhan AI