ग़ज़ल
करेंगे क़स्द हम जिस दम तुम्हारे घर में आवेंगे
کریں گے قصد ہم جس دم تمہارے گھر میں آویں گے
यह ग़ज़ल महबूब के प्रति आशिक़ के अटूट समर्पण और तीव्र उत्कंठा को दर्शाती है, जहाँ मिलने की चाह में उम्र भर का कठिन सफ़र भी एक पल में तय करने का संकल्प है। इसमें प्रेम में स्वयं को न्योछावर करने के आनंद को उभारा गया है, जहाँ महबूब के हाथों होने वाला क़त्ल भी शर्बत की मिठास जैसा लगता है।
Source: rekhta · HI
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1
करेंगे क़स्द हम जिस दम तुम्हारे घर में आवेंगे
जो होगी उम्र भर की राह तो दम भर में आवेंगे
2
अगर हाथों से उस शीरीं-अदा के ज़ब्ह होंगे हम
तो शर्बत के से घूँट आब-ए-दम-ए-ख़ंजर में आवेंगे
3
यही गर जोश-ए-गिर्या है तो बह कर साथ अश्कों के
हज़ारों पारा-ए-दिल मेरे चश्म-ए-तर में आवेंगे
4
गर इस क़ैद-ए-बला से अब की छूटेंगे तो फिर हरगिज़
न हम दाम-ए-फ़रेब-ए-शोख़-ए-ग़ारत-गर में आवेंगे
5
न जाते गरचे मर जाते जो हम मालूम कर जाते
कि इतना तंग जा कर कूचा-ए-दिलबर में आवेंगे
6
गरेबाँ-चाक लाखों हाथ से उस मेहर-ए-तलअत के
ब-रंग-ए-सुब्ह-ए-महशर अरसा-ए-महशर में आवेंगे
7
जो सरगरदानी अपनी तेरे दीवाने दिखाएँगे
तो फिर क्या क्या बगूले दश्त के चक्कर में आवेंगे
8
'ज़फ़र' अपना करिश्मा गर दिखाया चश्म-ए-साक़ी ने
तमाशे जाम-ए-जम के सब नज़र साग़र में आवेंगे
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