ग़ज़ल
हवा में फिरते हो क्या हिर्स और हवा के लिए
ہوا میں پھرتے ہو کیا حرص اور ہوا کے لیے
यह ग़ज़ल इंसानी लालच, अहंकार और सांसारिक मोह-माया से परे रहने की नैतिक सीख देती है। साथ ही, यह प्रेम में आत्म-समर्पण और अपने प्रिय के लिए सहर्ष कष्ट उठाने के गहरे जज़्बात को मार्मिक रूप से उजागर करती है।
Source: rekhta · HI
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1
हवा में फिरते हो क्या हिर्स और हवा के लिए
ग़ुरूर छोड़ दो ऐ ग़ाफ़िलो ख़ुदा के लिए
2
गिरा दिया है हमें किस ने चाह-ए-उल्फ़त में
हम आप डूबे किसी अपने आश्ना के लिए
3
जहाँ में चाहिए ऐवान ओ क़स्र शाहों को
ये एक गुम्बद-ए-गर्दूं है बस गदा के लिए
4
वो आईना है कि जिस को है हाजत-ए-सीमाब
इक इज़्तिराब है काफ़ी दिल-ए-सफ़ा के लिए
5
तपिश से दिल का हो क्या जाने सीने में क्या हाल
जो तेरे तीर का रौज़न न हो हवा के लिए
6
तबीब-ए-इश्क़ की दुक्काँ में ढूँडते फिरते
ये दर्दमंद-ए-मोहब्बत तिरी दवा के लिए
7
जो हाथ आए 'ज़फ़र' ख़ाक-पा-ए-'फ़ख़रूद्दीन'
तो मैं रखूँ उसे आँखों के तूतिया के लिए
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