ग़ज़ल
रंज और रंज भी तन्हाई का
رنج اور رنج بھی تنہائی کا
यह ग़ज़ल तन्हाई के असहनीय दर्द और विरह की पीड़ा को अत्यंत मार्मिक रूप में दर्शाती है। इसमें शायर अकेलेपन की लंबी और कष्टदायी रात की विवशता को व्यक्त करता है, जहाँ रुसवाई का अंदेशा और जीवन के बीत जाने का भय छाया हुआ है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
अभी गीत नहीं
1
रंज और रंज भी तन्हाई का
वक़्त पहुँचा मिरी रुस्वाई का
2
उम्र शायद न करे आज वफ़ा
काटना है शब-ए-तन्हाई का
3
तुम ने क्यूँ वस्ल में पहलू बदला
किस को दा'वा है शकेबाई का
4
एक दिन राह पे जा पहुँचे हम
शौक़ था बादिया-पैमाई का
5
उस से नादान ही बन कर मिलिए
कुछ इजारा नहीं दानाई का
6
सात पर्दों में नहीं ठहरती आँख
हौसला क्या है तमाशाई का
7
दरमियाँ पा-ए-नज़र है जब तक
हम को दा'वा नहीं बीनाई का
8
कुछ तो है क़द्र तमाशाई की
है जो ये शौक़ ख़ुद-आराई का
9
उस को छोड़ा तो है लेकिन ऐ दिल
मुझ को डर है तिरी ख़ुद-राई का
10
बज़्म-ए-दुश्मन में न जी से उतरा
पूछना क्या तिरी ज़ेबाई का
11
यही अंजाम था ऐ फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ
गुल ओ बुलबुल की शनासाई का
12
मदद ऐ जज़्बा-ए-तौफ़ीक़ कि याँ
हो चुका काम तवानाई का
13
मोहतसिब उज़्र बहुत हैं लेकिन
इज़्न हम को नहीं गोयाई का
14
होंगे 'हाली' से बहुत आवारा
घर अभी दूर है रुस्वाई का
Comments · 0
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
