ग़ज़ल

जीते जी मौत के तुम मुँह में न जाना हरगिज़

جیتے جی موت کے تم منہ میں نہ جانا ہرگز
अल्ताफ़ हुसैन हाली· Ghazal· 23 shers· radif: हरगिज़

इस ग़ज़ल में शायर अपने दोस्तों को इश्क़ के ख़तरनाक अंजाम से आगाह करते हुए दिल न लगाने की पुरज़ोर ताकीद करता है। वह मुहब्बत को जीते-जी मौत के मुँह में क़दम रखने और शेर से आँखें मिलाने जैसा जानलेवा ख़तरा क़रार देता है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
जीते जी मौत के तुम मुँह में न जाना हरगिज़ दोस्तो दिल न लगाना न लगाना हरगिज़
2
इश्क़ भी ताक में बैठा है नज़र-बाज़ों की देखना शेर से आँखें न लड़ाना हरगिज़
3
हाथ मलने न हों पीरी में अगर हसरत से तो जवानी में न ये रोग बसाना हरगिज़
4
जितने रस्ते थे तिरे हो गए वीराँ ऐ इश्क़ आ के वीरानों में अब घर न बसाना हरगिज़
5
कूच सब कर गए दिल्ली से तिरे क़द्र-शनास क़द्र याँ रह के अब अपनी न गँवाना हरगिज़
6
तज़्किरा देहली-ए-मरहूम का ऐ दोस्त न छेड़ न सुना जाएगा हम से ये फ़साना हरगिज़
7
ढूँडता है दिल-ए-शोरीदा बहाने मुतरिब दर्द-अंगेज़ ग़ज़ल कोई न गाना हरगिज़
8
सोहबतें अगली मुसव्विर हमें याद आएँगी कोई दिलचस्प मुरक़्क़ा न दिखाना हरगिज़
9
ले के दाग़ आएगा सीने पे बहुत ऐ सय्याह देख इस शहर के खंडरों में न जाना हरगिज़
10
चप्पे चप्पे पे हैं याँ गौहर-ए-यकता तह-ए-ख़ाक दफ़्न होगा कहीं इतना न ख़ज़ाना हरगिज़
11
मिट गए तेरे मिटाने के निशाँ भी अब तो ऐ फ़लक इस से ज़ियादा न मिटाना हरगिज़
12
वो तो भूले थे हमें हम भी उन्हें भूल गए ऐसा बदला है न बदलेगा ज़माना हरगिज़
13
हम को गर तू ने रुलाया तो रुलाया ऐ चर्ख़ हम पे ग़ैरों को तो ज़ालिम न हँसाना हरगिज़
14
आख़िरी दौर में भी तुझ को क़सम है साक़ी भर के इक जाम न प्यासों को पिलाना हरगिज़
15
बख़्त सोए हैं बहुत जाग के ऐ दौर-ए-ज़माँ न अभी नींद के मातों को जगाना हरगिज़
16
कभी ऐ इल्म ओ हुनर घर था तुम्हारा दिल्ली हम को भूले हो तो घर भूल न जाना हरगिज़
17
शाइरी मर चुकी अब ज़िंदा न होगी यारो याद कर कर के उसे जी न कुढ़ाना हरगिज़
18
'ग़ालिब' ओ 'शेफ़्ता' ओ 'नय्यर' ओ 'आज़ुर्दा' ओ 'ज़ौक़' अब दिखाएगा ये शक्लें न ज़माना हरगिज़
19
'मोमिन' ओ 'अल्वी' ओ 'सहबाई' ओ 'ममनूँ' के बाद शेर का नाम न लेगा कोई दाना हरगिज़
20
कर दिया मर के यगानों ने यगाना हम को वर्ना याँ कोई न था हम में यगाना हरगिज़
21
'दाग़' ओ 'मजरूह' को सुन लो कि फिर इस गुलशन में न सुनेगा कोई बुलबुल का तराना हरगिज़
22
रात आख़िर हुई और बज़्म हुई ज़ेर-ओ-ज़बर अब न देखोगे कभी लुत्फ़-ए-शबाना हरगिज़
23
बज़्म-ए-मातम तो नहीं बज़्म-ए-सुख़न है 'हाली' याँ मुनासिब नहीं रो रो के रुलाना हरगिज़
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