ग़ज़ल
इश्क़ को तर्क-ए-जुनूँ से क्या ग़रज़
عشق کو ترک جنوں سے کیا غرض
यह ग़ज़ल इश्क़ के असीम जुनून और उसकी स्वायत्तता को दर्शाती है, जहाँ सच्चा प्रेमी दुनियावी समझदारी या संयम की बंदिशों से बेपरवाह होता है। इसमें यह भाव प्रमुख है कि यदि दिल में सच्ची लगन और तलब हो, तो पथिक को किसी रहनुमा या बाहरी सहारे की आवश्यकता नहीं होती।
Source: rekhta · HI
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1
इश्क़ को तर्क-ए-जुनूँ से क्या ग़रज़
चर्ख़-ए-गर्दां को सुकूँ से क्या ग़रज़
2
दिल में है ऐ ख़िज़्र गर सिदक़-ए-तलब
राह-रौ को रहनुमों से क्या ग़रज़
3
हाजियो है हम को घर वाले से काम
घर के मेहराब ओ सुतूँ से क्या ग़रज़
4
गुनगुना कर आप रो पड़ते हैं जो
उन को चंग ओ अरग़नूँ से क्या ग़रज़
5
नेक कहना नेक जिस को देखना
हम को तफ़्तीश-ए-दरूँ से क्या ग़रज़
6
दोस्त हैं जब ज़ख़्म-ए-दिल से बे-ख़बर
उन को अपने अश्क-ए-ख़ूँ से क्या ग़रज़
7
इश्क़ से है मुजतनिब ज़ाहिद अबस
शेर को सैद-ए-ज़बूँ से क्या ग़रज़
8
कर चुका जब शैख़ तस्ख़ीर-ए-क़ुलूब
अब उसे दुनिया-ए-दूँ से क्या ग़रज़
9
आए हो 'हाली' पए-तस्लीम याँ
आप को चून-ओ-चगूँ से क्या ग़रज़
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