ग़ज़ल
है जुस्तुजू कि ख़ूब से है ख़ूब-तर कहाँ
ہے جستجو کہ خوب سے ہے خوب تر کہاں
यह ग़ज़ल सुंदरता और पूर्णता की अंतहीन खोज तथा मानवीय चेतना के दार्शनिक विस्तार को दर्शाती है। इसमें आत्म-विस्मृति और जिज्ञासा के भाव के साथ यह विचार व्यक्त किया गया है कि श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठतर की यह यात्रा किस मंज़िल पर जाकर थमेगी।
Source: rekhta · HI
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1
है जुस्तुजू कि ख़ूब से है ख़ूब-तर कहाँ
अब ठहरती है देखिए जा कर नज़र कहाँ
2
हैं दौर-ए-जाम-ए-अव्वल-ए-शब में ख़ुदी से दूर
होती है आज देखिए हम को सहर कहाँ
3
या रब इस इख़्तिलात का अंजाम हो ब-ख़ैर
था उस को हम से रब्त मगर इस क़दर कहाँ
4
इक उम्र चाहिए कि गवारा हो नीश-ए-इश्क़
रक्खी है आज लज़्ज़त-ए-ज़ख़्म-ए-जिगर कहाँ
5
बस हो चुका बयाँ कसल-ओ-रंज-ए-राह का
ख़त का मिरे जवाब है ऐ नामा-बर कहाँ
6
कौन ओ मकाँ से है दिल-ए-वहशी कनारा-गीर
इस ख़ानुमाँ-ख़राब ने ढूँडा है घर कहाँ
7
हम जिस पे मर रहे हैं वो है बात ही कुछ और
आलम में तुझ से लाख सही तू मगर कहाँ
8
होती नहीं क़ुबूल दुआ तर्क-ए-इश्क़ की
दिल चाहता न हो तो ज़बाँ में असर कहाँ
9
'हाली' नशात-ए-नग़्मा-ओ-मय ढूँढते हो अब
आए हो वक़्त-ए-सुब्ह रहे रात भर कहाँ
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