ग़ज़ल

गो जवानी में थी कज-राई बहुत

گو جوانی میں تھی کج رائی بہت
अल्ताफ़ हुसैन हाली· Ghazal· 12 shers· radif: बहुत

इस ग़ज़ल में शायर अपनी जवानी की कमियों और भटकावों को स्वीकार करते हुए भी उस दौर की जीवंतता को शिद्दत से याद करता है। इसमें गुज़रे ज़माने के हुस्न-ओ-इश्क़ की कशिश और यादों की कसक को बड़े ही पुरअसर अंदाज़ में बयां किया गया है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
गो जवानी में थी कज-राई बहुत पर जवानी हम को याद आई बहुत
2
ज़ेर-ए-बुर्क़ा तू ने क्या दिखला दिया जम्अ हैं हर सू तमाशाई बहुत
3
हट पे इस की और पिस जाते हैं दिल रास है कुछ उस को ख़ुद-राई बहुत
4
सर्व या गुल आँख में जचते नहीं दिल पे है नक़्श उस की रानाई बहुत
5
चूर था ज़ख़्मों में और कहता था दिल राहत इस तकलीफ़ में पाई बहुत
6
आ रही है चाह-ए-यूसुफ़ से सदा दोस्त याँ थोड़े हैं और भाई बहुत
7
वस्ल के हो हो के सामाँ रह गए मेंह न बरसा और घटा छाई बहुत
8
जाँ-निसारी पर वो बोल उट्ठे मिरी हैं फ़िदाई कम तमाशाई बहुत
9
हम ने हर अदना को आला कर दिया ख़ाकसारी अपनी काम आई बहुत
10
कर दिया चुप वाक़िआत-ए-दहर ने थी कभी हम में भी गोयाई बहुत
11
घट गईं ख़ुद तल्ख़ियाँ अय्याम की या गई कुछ बढ़ शकेबाई बहुत
12
हम न कहते थे कि 'हाली' चुप रहो रास्त-गोई में है रुस्वाई बहुत
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गो जवानी में थी कज-राई बहुत | Sukhan AI