આત્મલક્ષમાં નહિ પર આપ વણસંતાને કે નો બાપ;

“Not for self-gain, nor for others' grace,Who is a father without a child's embrace?”

— अखा भगत
अर्थ

यह दोहा बताता है कि हमें अपने स्वार्थ या दूसरों की कृपा के लिए नहीं, बल्कि देने के उद्देश्य से कार्य करना चाहिए। यह पूछता है कि संतान के बिना कौन पिता हो सकता है, जिसका अर्थ है कि दूसरों को देना ही हमारे उद्देश्य की पूर्ति है।

विस्तार

यह दोहा हमें समझाता है कि आत्मिक लक्ष्य या अपनी पहचान खोजना केवल खुद में सिमट जाना नहीं है। इसके बजाय, यह हमें दूसरों के प्रति सेवा और दान की ओर बढ़ने का संकेत देता है। इसे ऐसे समझें: कोई भी व्यक्ति बिना संतान के पिता नहीं कहला सकता, ठीक वैसे ही, हमारी आंतरिक वृद्धि और समझ भी तब तक अधूरी है जब तक हम अपने आस-पास की दुनिया को कुछ देते नहीं। यह दर्शाता है कि अपनी 'स्वयं' को खोजना एकाकी यात्रा नहीं है, बल्कि करुणा और सेवा से गहराई से जुड़ी है। हमें अपने जीवन का गहरा अर्थ और शांति दूसरों के लिए कुछ करने में मिलती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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