શિષ્ય રાખ્યાનો શિરપર ભાર ઉપર ત્યાગ ને અંતર પ્યાર;

“The burden of keeping a disciple upon the head; Outwardly renunciation, inwardly love instead.”

— अखा भगत
अर्थ

शिष्य रखने का सिर पर भार होता है; बाहर से त्याग और भीतर से प्यार।

विस्तार

यह दोहा एक गुरु या संरक्षक की गहरी भूमिका को खूबसूरती से समझाता है। यह कहता है कि एक शिष्य को स्वीकार करना एक बड़ी जिम्मेदारी है, 'सिर पर एक भार'। एक सच्चा शिक्षक अपने छात्र का मार्गदर्शन करने का बोझ उठाता है। और वे यह कैसे करते हैं? 'ऊपर त्याग और भीतर प्यार।' इसका मतलब है कि एक गुरु बाहरी रूप से शायद अनासक्त या अनुशासित दिख सकता है, या अपने छात्रों से अनुशासन और त्याग की मांग कर सकता है, मानो व्यक्तिगत लगाव या सांसारिक सुखों का त्याग कर रहा हो। फिर भी, उनके दिल के भीतर, उनका हर कार्य शिष्य के विकास और कल्याण के लिए शुद्ध प्रेम और स्नेह में निहित होता है। यह एक निस्वार्थ प्रेम है जो सीखने और परिवर्तन के मार्ग को निर्देशित करता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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