ग़ज़ल

તેની વાત ન જાણે ગૂઢ

તેની વાત ન જાણે ગૂઢ
अखा भगत· Ghazal· 6 shers

यह ग़ज़ल एक ऐसे 'गुरु' की आलोचना करती है जो स्वयं को स्वामी मानता है, परंतु भीतर से अज्ञानी और सांसारिक आशाओं से बंधा हुआ है। वह शिष्यों को रखने का भार ढोता है और ऊपर से त्याग का दिखावा करता है, जबकि उसका मन माया में फंसा हुआ है। अखा भगत ऐसे व्यक्ति को सच्चा ज्ञानी नहीं मानते।

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लिपि व अर्थ
1
તેની વાત ન જાણે ગૂઢ અખા ગુરુ થઇ બેઠો મૂઢ.
वह गहरे, छिपे हुए सत्य को नहीं जानता। अखा, एक गुरु होकर भी मूर्ख की तरह बैठा है।
2
સ્વામી થઇને બેઠો આપ એ તો મનને વળગ્યું પાપ;
आप स्वामी बनकर बैठ गए हैं, यह तो मन से चिपका हुआ पाप है।
3
શિષ્ય રાખ્યાનો શિરપર ભાર ઉપર ત્યાગ ને અંતર પ્યાર;
शिष्य रखने का सिर पर भार होता है; बाहर से त्याग और भीतर से प्यार।
4
આશા રજ્જુને બાંધ્યો પાશ અખા શું જાણે જ્ઞાનીની આશ.
आशा रूपी रस्सी से बंधन का फंदा बंधा है। हे अखा, ज्ञानी की सच्ची आशा को भला कोई क्या जान सकता है?
5
જ્ઞાની ગુરુ ન થાયે કે નો બ્રહ્મા વિષ્ણુ મહે શ્વર તેનો;
एक ज्ञानी गुरु किसी का देवता नहीं बनता। ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर अपनी व्यक्तिगत भक्ति के लिए हैं।
6
અન્ય જીવની તેને શી પડી જે તેને ઘેર નિત્ય કાઢે હડી;
वह दूसरों के दुख-दर्द की परवाह कैसे करेगा, जो रोज़ अपने ही घर में झगड़े और परेशानियाँ खड़ी करता है?
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