ग़ज़ल

અખા તે ગુરુના મનમાં ખરા

અખા તે ગુરુના મનમાં ખરા
अखा भगत· Ghazal· 6 shers

यह गज़ल, "अखा भगत 11", ऐसे गुरु की आलोचना करती है जो नेतृत्व के अहंकार में डूब जाता है और मार्गदर्शन के बजाय दुख का कारण बनता है। यह बताती है कि कैसे ऐसा गुरु शब्दों के जाल में उलझ जाता है, और इसकी तुलना एक सच्चे ज्ञानी व्यक्ति की बुद्धिमत्ता से करती है जो आत्मा का स्वागत और उत्थान करता है। कविता इस बात पर जोर देती है कि सच्चा आध्यात्मिक मार्गदर्शन झूठे अधिकार के कष्ट से मुक्त होता है।

गीत सुनें
लिपि व अर्थ
1
અખા તે ગુરુના મનમાં ખરા જીવ આવકાર દઇ બેસારે પરા.
हे अखा, जो गुरु के मन में सच्चे होते हैं, आत्मा उन्हें स्वागत करती है और एक उच्च स्थान पर बिठाती है।
2
ગુરુ થઇ બેઠો શેનો સાધ સ્વામીપણાની વળગી વ્યાધ;
तुम गुरु होकर क्यों बैठे हो, किस साधना का दावा करते हो? तुम्हें स्वामित्व का रोग लग गया है।
3
તે પીડાથી દુઃખિયો થયો રોગ કરાર અનુભવથી ગયો;
वह उस पीड़ा से दुखी हो गया। अनुभव से रोग शांत हो गया।
4
વાયક જાળમાં ઘુંચવી મરે અખા જ્ઞાનીનું કહ્યું કે મ કરે.
शब्दों के जाल में फंसकर व्यक्ति नष्ट हो जाता है। अखा पूछता है कि लोग ज्ञानियों की सलाह क्यों नहीं मानते।
5
જ્ઞાનીને તો સર્વે ફોક બ્રહ્માદિલગી કલ્પ્યાં લોક;
ज्ञानी व्यक्ति के लिए सब कुछ व्यर्थ है, ब्रह्मा आदि द्वारा कल्पित सभी लोक भी निरर्थक हैं।
6
ત્રણકાંડ કાળની માંડણી તત્વવેત્તાએ એવી ગણી;
काल की त्रि-विभाजित व्यवस्था को तत्ववेत्ताओं ने इसी प्रकार माना है।
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