रंग-ए-बनफ़शा मिट गया सुंबुल-ए-तर नहीं रहा सेहन-ए-चमन में ज़ीनत-ए-नक़्श-ओ-निगार हो चुकी

“The violet's hue has faded away, the fresh hyacinth is no more; in the garden's courtyard, the painted splendor has run its course.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

बनफ़्शा का रंग मिट गया है और ताज़ा सुंबुल भी बाकी नहीं रहा; बाग़ के आँगन में सजे नक़्श-ओ-निगार और ख़ूबसूरती अब ख़त्म हो चुकी है।

विस्तार

यह शेर ढलते हुए वक़्त और बिखरती हुई खूबसूरती का एक बड़ा ही पुरदर्द मंज़र पेश करता है। बनफ़शा का गहरा रंग उड़ चुका है और तरो-ताज़ा सुम्बुल भी मुरझा गया है, यानी बाग़ का सारा बनाव-शृंगार और नक़्श-ओ-निगार अब मुकम्मल होकर ख़त्म हो चुके हैं। बाग़ की इस वीरानी के ज़रिए शायर दरअसल ज़िंदगी के उस मोड़ की बात कर रहा है जहाँ जवानी, दिलकशी और सारी रौनक़ें बीत जाती हैं और सिर्फ़ यादें बाक़ी रह जाती हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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