लाल-ए-लब का तिरे बोसा तो मैं लेता हूँ मगर डर ये है ख़ून-ए-जिगर बाद में पीना होगा

“Though I may taste the ruby of your lips, a lingering dread remains: that afterwards, the blood of my own heart must be the cup I drain.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

मैं तुम्हारे लाल होंठों को चूम तो लेता हूँ, लेकिन डर यह है कि इसके बाद मुझे अपने जिगर का ख़ून पीना पड़ेगा।

विस्तार

शायर यहाँ प्यार के उस लम्हे को बयां कर रहे हैं जहाँ बेइंतहा खुशी के साथ बिछड़ने का खौफ भी जुड़ा होता है। महबूब के सुर्ख होंठों को चूमने की ख्वाहिश तो पूरी हो सकती है, लेकिन शायर को डर है कि इस पल-भर के आनंद की भारी कीमत उसे बाद में चुकानी पड़ेगी। इश्क़ की यह मिठास अपने पीछे जो गहरा दर्द और तड़प छोड़ जाती है, शेर उसी ख़ूबसूरत कशमकश को दर्शाता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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