“Let us see if the memory of that rose-like cheek now reaches my lips; / By strolling through the garden, at least I have diverted my heart.”
देखना है कि अब उस गुलाब जैसे गालों वाले महबूब की याद होठों तक आती है या नहीं; हमने बाग़ की सैर करके अपना दिल बहलाने की कोशिश तो की है।
शायर ने दिल बहलाने और महबूब की याद से बचने के लिए बाग़ की सैर तो कर ली, मगर यहाँ एक ख़ूबसूरत विडंबना छिपी है। फूलों को देखकर दिल को सुकून मिलने के बजाय महबूब के गुलाब जैसे गालों की याद और भी ताज़ा हो उठती है। वह ख़ुद को तसल्ली दे रहे हैं कि शायद यह याद लबों तक न आए और आह बनकर न निकले, पर हक़ीक़त यह है कि बाग़बान के बीच उस नाज़ुक चेहरे को भुलाना मुमकिन ही कहाँ है।
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