“In love with an idol, I was forced to honor heresy; whatever the Brahmin ordained, at last I had to do it all.”
माशूक के इश्क़ में मुझे कुफ़्र का भी अदब करना पड़ा, और आख़िरकार ब्राह्मण ने जो कुछ भी कहा मुझे वह सब करना पड़ा।
इस शेर में शायर महबूब के इश्क़ में पूरी तरह समर्पित हो जाने की बेबसी और ख़ूबसूरती को बयां कर रहे हैं। उर्दू शायरी में महबूब को 'बुत' (मूर्ति) और इश्क़ की दीवानगी को 'कुफ़्र' कहना एक आम रिवायत है, जहाँ आशिक़ के लिए महबूब ही उसका खुदा बन जाता है। यहाँ आशिक़ कह रहा है कि प्यार के उस मंदिर में रस्म-ओ-रिवाज वही चले जो वहाँ के बरहमन यानी मोहब्बत के कायदों ने तय किए, और दुनिया के सारे नियम पीछे छूट गए।
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