ग़ज़ल
हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना
حیا سے سر جھکا لینا ادا سے مسکرا دینا
यह ग़ज़ल महबूब के नाज़-ओ-अंदाज़, हया और दिलकश मुस्कान के जादुई प्रभाव को बयां करती है, जो प्रेमी के दिल को बड़ी सरलता से घायल कर देती है। इसमें प्रेम के उस विरोधाभासी दर्द को दर्शाया गया है जहाँ महबूब ही तड़प का कारण बनता है और वही उसका एकमात्र इलाज भी है।
Source: rekhta · HI
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1
हया से सर झुका लेना अदा से मुस्कुरा देना
हसीनों को भी कितना सहल है बिजली गिरा देना
2
ये तर्ज़ एहसान करने का तुम्हीं को ज़ेब देता है
मरज़ में मुब्तला कर के मरीज़ों को दवा देना
3
बलाएँ लेते हैं उन की हम उन पर जान देते हैं
ये सौदा दीद के क़ाबिल है क्या लेना है क्या देना
4
ख़ुदा की याद में महवियत-ए-दिल बादशाही है
मगर आसाँ नहीं है सारी दुनिया को भुला देना
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