ग़ज़ल
हाल-ए-दिल मैं सुना नहीं सकता
حال دل میں سنا نہیں سکتا
यह ग़ज़ल दिल के गहरे जज़्बात और प्रेम की अवर्णनीय स्थिति को रेखांकित करती है। इसमें बताया गया है कि शब्द दिल के सच्चे दर्द और अहसासों को समेटने में असमर्थ हैं, और नाज़ुक मिज़ाज इश्क़ अक़्ल की बंदिशों और तर्कों से कहीं परे है।
Source: rekhta · HI
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अभी गीत नहीं
1
हाल-ए-दिल मैं सुना नहीं सकता
लफ़्ज़ मा'ना को पा नहीं सकता
2
इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद
अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता
3
होश आरिफ़ की है यही पहचान
कि ख़ुदी में समा नहीं सकता
4
पोंछ सकता है हम-नशीं आँसू
दाग़-ए-दिल को मिटा नहीं सकता
5
मुझ को हैरत है उस की क़ुदरत पर
अलम उस को घटा नहीं सकता
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