ग़ाफ़िलों के लुत्फ़ को काफ़ी है दुनियावी ख़ुशी आक़िलों को बे-ग़म-ए-उक़्बा मज़ा मिलता नहीं

“For the heedless, worldly joy is pleasure enough to know; yet the wise can find no relish without the hereafter's woe.”

— अकबर इलाहाबादी
अर्थ

ग़ाफ़िल (बेपरवाह) लोगों के आनंद के लिए दुनियावी ख़ुशी ही काफ़ी है, लेकिन अक़्लमंद लोगों को आख़िरत की फ़िक्र और ग़म के बिना कोई मज़ा नहीं मिलता।

विस्तार

शायर यहाँ दो तरह की सोच का फ़र्क़ समझाते हैं—एक बेफ़िक्री का और दूसरा हिकमत का। जो लोग ज़िंदगी की हक़ीक़त से अनजान हैं, उनके लिए दुनिया की छोटी-मोटी और आरज़ी ख़ुशियाँ ही बहुत हैं। मगर समझदार और बेदार इंसानों को इन सतही सुखों से तसल्ली नहीं मिलती; उनका असली लुत्फ़ उस रूहानी फ़िक्र और आख़िरत के अहसास से जुड़ा है जो रूह को असल गहराई बख़्शती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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