“I dwell within this world, yet seek no worldly prize; I have walked through the bazaar, but not as one who buys.”
मैं इस दुनिया में रहता ज़रूर हूँ लेकिन मुझे इस सांसारिक सुखों की कोई चाहत नहीं है। मैं बाज़ार से गुज़रा तो हूँ, लेकिन किसी चीज़ का ख़रीदार नहीं हूँ।
अकबर इलाहाबादी का यह मशहूर शेर ज़िंदगी को एक बड़े और चहल-पहल वाले बाज़ार की तरह देखता है, जहाँ हर तरफ़ चमक-दमक और लुभावनी चीज़ें सजी हैं। शायर कहते हैं कि वह इस दुनिया में रहते ज़रूर हैं, लेकिन इसकी भौतिक लालसाओं और मोह-माया के तलबगार नहीं हैं। यह एक सूफ़ी मिज़ाज की खूबसूरत आज़ादी है, जहाँ इंसान दुनिया के बीचों-बीच चलते हुए भी अपने दिल को उसकी ग़ुलामी से पूरी तरह महफ़ूज़ रखता है।
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