غزل

غضب کیا ترے وعدے پہ اعتبار کیا

غضب کیا ترے وعدے پہ اعتبار کیا
داغ دہلوی· Ghazal· 29 shers· radif: किया

یہ غزل محبوب کے جھوٹے وعدے پر اعتبار کرنے کے پچھتاوے اور ہجر کی جانکاہ رات کے کرب کو خوبصورتی سے بیان کرتی ہے۔ شاعر اپنی بے لوث وفا اور اس کے نتیجے میں ملنے والی رسوائی و مایوسی کا گلہ نہایت پردرد انداز میں کرتا ہے۔

Source: rekhta · HI

نغمہ سنیں
ابھی نغمہ نہیں
رسم الخط
1
ग़ज़ब किया तिरे वअ'दे पे ए'तिबार किया तमाम रात क़यामत का इंतिज़ार किया
غضب کیا ترے وعدے پہ اعتبار کیا تمام رات قیامت کا انتظار کیا
2
किसी तरह जो न उस बुत ने ए'तिबार किया मिरी वफ़ा ने मुझे ख़ूब शर्मसार किया
کسی طرح جو نہ اس بت نے اعتبار کیا مری وفا نے مجھے خوب شرمسار کیا
3
हँसा हँसा के शब-ए-वस्ल अश्क-बार किया तसल्लियाँ मुझे दे दे के बे-क़रार किया
ہنسا ہنسا کے شب وصل اشک بار کیا تسلیاں مجھے دے دے کے بے قرار کیا
4
ये किस ने जल्वा हमारे सर-ए-मज़ार किया कि दिल से शोर उठा हाए बे-क़रार किया
یہ کس نے جلوہ ہمارے سر مزار کیا کہ دل سے شور اٹھا ہائے بے قرار کیا
5
सुना है तेग़ को क़ातिल ने आब-दार किया अगर ये सच है तो बे-शुबह हम पे वार किया
سنا ہے تیغ کو قاتل نے آب دار کیا اگر یہ سچ ہے تو بے شبہ ہم پہ وار کیا
6
न आए राह पे वो इज्ज़ बे-शुमार किया शब-ए-विसाल भी मैं ने तो इंतिज़ार किया
نہ آئے راہ پہ وہ عجز بے شمار کیا شب وصال بھی میں نے تو انتظار کیا
7
तुझे तो वादा-ए-दीदार हम से करना था ये क्या किया कि जहाँ को उमीद-वार किया
تجھے تو وعدۂ دیدار ہم سے کرنا تھا یہ کیا کیا کہ جہاں کو امیدوار کیا
8
ये दिल को ताब कहाँ है कि हो मआल-अंदेश उन्हों ने वअ'दा किया इस ने ए'तिबार किया
یہ دل کو تاب کہاں ہے کہ ہو مآل اندیش انہوں نے وعدہ کیا اس نے اعتبار کیا
9
कहाँ का सब्र कि दम पर है बन गई ज़ालिम ब तंग आए तो हाल-ए-दिल आश्कार किया
کہاں کا صبر کہ دم پر ہے بن گئی ظالم بہ تنگ آئے تو حال دل آشکار کیا
10
तड़प फिर ऐ दिल-ए-नादाँ कि ग़ैर कहते हैं अख़ीर कुछ न बनी सब्र इख़्तियार किया
تڑپ پھر اے دل ناداں کہ غیر کہتے ہیں اخیر کچھ نہ بنی صبر اختیار کیا
11
मिले जो यार की शोख़ी से उस की बेचैनी तमाम रात दिल-ए-मुज़्तरिब को प्यार किया
ملے جو یار کی شوخی سے اس کی بے چینی تمام رات دل مضطرب کو پیار کیا
12
भुला भुला के जताया है उन को राज़-ए-निहाँ छुपा छुपा के मोहब्बत को आश्कार किया
بھلا بھلا کے جتایا ہے ان کو راز نہاں چھپا چھپا کے محبت کو آشکار کیا
13
न उस के दिल से मिटाया कि साफ़ हो जाता सबा ने ख़ाक परेशाँ मिरा ग़ुबार किया
نہ اس کے دل سے مٹایا کہ صاف ہو جاتا صبا نے خاک پریشاں مرا غبار کیا
14
हम ऐसे महव-ए-नज़ारा न थे जो होश आता मगर तुम्हारे तग़ाफ़ुल ने होश्यार किया
ہم ایسے محو نظارہ نہ تھے جو ہوش آتا مگر تمہارے تغافل نے ہوشیار کیا
15
हमारे सीने में जो रह गई थी आतिश-ए-हिज्र शब-ए-विसाल भी उस को न हम-कनार किया
ہمارے سینے میں جو رہ گئی تھی آتش ہجر شب وصال بھی اس کو نہ ہمکنار کیا
16
रक़ीब ओ शेवा-ए-उल्फ़त ख़ुदा की क़ुदरत है वो और इश्क़ भला तुम ने ए'तिबार किया
رقیب و شیوۂ الفت خدا کی قدرت ہے وہ اور عشق بھلا تم نے اعتبار کیا
17
ज़बान-ए-ख़ार से निकली सदा-ए-बिस्मिल्लाह जुनूँ को जब सर-ए-शोरीदा पर सवार किया
زبان خار سے نکلی صدائے بسم اللہ جنوں کو جب سر شوریدہ پر سوار کیا
18
तिरी निगह के तसव्वुर में हम ने ऐ क़ातिल लगा लगा के गले से छुरी को प्यार किया
تری نگہ کے تصور میں ہم نے اے قاتل لگا لگا کے گلے سے چھری کو پیار کیا
19
ग़ज़ब थी कसरत-ए-महफ़िल कि मैं ने धोके में हज़ार बार रक़ीबों को हम-कनार किया
غضب تھی کثرت محفل کہ میں نے دھوکہ میں ہزار بار رقیبوں کو ہمکنار کیا
20
हुआ है कोई मगर उस का चाहने वाला कि आसमाँ ने तिरा शेवा इख़्तियार किया
ہوا ہے کوئی مگر اس کا چاہنے والا کہ آسماں نے ترا شیوہ اختیار کیا
21
न पूछ दिल की हक़ीक़त मगर ये कहते हैं वो बे-क़रार रहे जिस ने बे-क़रार किया
نہ پوچھ دل کی حقیقت مگر یہ کہتے ہیں وہ بے قرار رہے جس نے بے قرار کیا
22
जब उन को तर्ज़-ए-सितम आ गए तो होश आया बुरा हो दिल का बुरे वक़्त होश्यार किया
جب ان کو طرز ستم آ گئے تو ہوش آیا برا ہو دل کا برے وقت ہشیار کیا
23
फ़साना-ए-शब-ए-ग़म उन को इक कहानी थी कुछ ए'तिबार किया कुछ न ए'तिबार किया
فسانۂ شب غم ان کو اک کہانی تھی کچھ اعتبار کیا کچھ نہ اعتبار کیا
24
असीरी दिल-ए-आशुफ़्ता रंग ला के रही तमाम तुर्रा-ए-तर्रार तार तार किया
اسیری دل آشفتہ رنگ لا کے رہی تمام طرۂ طرار تار تار کیا
25
कुछ आ गई दावर-ए-महशर से है उम्मीद मुझे कुछ आप ने मिरे कहने का ए'तिबार किया
کچھ آ گئی داور محشر سے ہے امید مجھے کچھ آپ نے مرے کہنے کا اعتبار کیا
26
किसी के इश्क़-ए-निहाँ में ये बद-गुमानी थी कि डरते डरते ख़ुदा पर भी आश्कार किया
کسی کے عشق نہاں میں یہ بد گمانی تھی کہ ڈرتے ڈرتے خدا پر بھی آشکار کیا
27
फ़लक से तौर क़यामत के बन न पड़ते थे अख़ीर अब तुझे आशोब-ए-रोज़गार किया
فلک سے طور قیامت کے بن نہ پڑتے تھے اخیر اب تجھے آشوب روزگار کیا
28
वो बात कर जो कभी आसमाँ से हो न सके सितम किया तो बड़ा तू ने इफ़्तिख़ार किया
وہ بات کر جو کبھی آسماں سے ہو نہ سکے ستم کیا تو بڑا تو نے افتخار کیا
29
बनेगा मेहर-ए-क़यामत भी एक ख़ाल-ए-सियाह जो चेहरा 'दाग़'-ए-सियह-रू ने आश्कार किया
بنے گا مہر قیامت بھی ایک خال سیاہ جو چہرہ داغؔ سیہ رو نے آشکار کیا
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