شاعروں کی کہانیاں · 10:14
साहिर लुधियानवी: अवाम के शायर
Sahir Ludhianvi: Avaam ke Shayar
Sahir Ludhianvi
اس ویڈیو کے بارے میں
साहिर लुधियानवी, जिनका असली नाम अब्दुल हयी था, 1921 में लुधियाना में जन्मे। उनका बचपन पारिवारिक तनाव और सामाजिक उथल-पुथल से भरा था, जिसने उनके विचारों और शायरी को गहराई दी। माँ से प्रेम और पिता से नफरत ने उनके भीतर विद्रोही और प्रगतिशील सोच को जन्म दिया। लाहौर जाकर वे प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े और मजदूरों, किसानों की आवाज बने। उनकी पहली किताब 'तल्खियाँ' ने साहित्य जगत में हलचल मचा दी। विभाजन के बाद बंबई पहुंचे, जहां सिनेमा में उनकी शुरुआत असफल रही, लेकिन जल्द ही एस.डी. बर्मन और चोपड़ा बंधुओं के साथ उनकी जोड़ी ने फिल्मी गीतों को साहित्यिक ऊँचाई दी। अमृता प्रीतम और सुधा मल्होत्रा के साथ उनके संबंध, और गीतकारों के सम्मान के लिए उनकी जिद, उनके व्यक्तित्व की खासियत रही। पद्मश्री और अन्य सम्मान पाने वाले साहिर की शायरी और गीत आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं।
- ◆साहिर का बचपन पारिवारिक संघर्षों से भरा था।
- ◆लाहौर में वे प्रगतिशील आंदोलनों से जुड़े।
- ◆उनकी शायरी ने आम लोगों की आवाज उठाई।
- ◆फिल्मी गीतों को उन्होंने साहित्यिक ऊँचाई दी।
- ◆गीतकारों के सम्मान के लिए उन्होंने संघर्ष किया।
- ◆उनकी विरासत आज भी जीवित है।
اس ویڈیو کے اشعار
दुनिया ने तज़रबात और हवादिस की शकल में जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूं मैं।
Duniya ne tajurbaat aur hawadis ki shakal mein jo kuch mujhe diya hai, woh lauta raha hoon main.
I am returning to the world all that it has given me in the form of experiences and events.
साहिर ने एक प्यार किया और एक नफरत पाली। अपनी माँ से प्यार और पिता से नफरत।
Sahir ne ek pyaar kiya aur ek nafrat paali. Apni maa se pyaar aur pita se nafrat.
Sahir loved his mother and harbored hatred for his father.
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दुनिया ने तज़रबात और हवादिस की शकल में जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूं मैं।
मशूर शायर साहिर लुध्यानवी का ये शेर असल में उनकी पूरी जिंदगी और उनकी कला का सबसे सटीक निचोड है।
यहाँ तज़रबात का मतलब है अनुभव और हवादिस यानी जिंदगी के हाथ से या दुरखटनाई।
आज के इस खास एतिहासिक विशलेशर में हम साहिर लुध्यानवी, जिनका असली नाम अब्दुल है था, उनकी असाधारन जीवन, उनकी भैतरीन शायरी और उनकी कभी ना मिटने वाली विरासक पर गहराई से बात करेंगे।
बटवारे से पहले के पंजाब से लेकर हिंदुस्तानी सिनिमा पर उनकी जो एक बहुत गहरी चाप रही है, हम उस पूरे सफर को समझेंगे। ये कहानी महज़ एक इंसान की नहीं है, बलकि एक पूरे यूग की आवाज है।
तो चलिए, एतिहासिक और बिल्कुल प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर इस सफर पर निकलते हैं। हम इस पूरी कहानी को छे एहम हिस्सों में बात कर समझेंगे। पहला, लुध्याना का वो लड़का। दूसरा, लाहौर का दौर और उनकी राजनीतिक चेतना। तीसरा
पहले, लुध्याना का लड़का। ये कहानी 1920 के दश्यक में शुरू होती है। उस वक्त का पंजाब बटा नहीं था और समाज में जमींदारी और सामन्ती विवस्था का बहुत गेहरा असर था।
आठ मार्झ, 1921 को एक बेहद रईस और संपन गुर्जर परिवार में अब्दुल हई का जन हुआ। लेकिन सच कहूं तो ये अमीरी उनके किसी काम की नहीं थी। बल्कि इसने उनकी जिंदिकी में एक बहुत बड़ी मानसिक उथलपुथल मचा दी। उनका बच्पन बह
सरदार बेगम को सुरक्षा की जरूरत पड़ी और उन्हें भयाना गरीबी का सामना करना पड़ा। जरा सोचिए, एक छोटे और सम्वेदन्शिल बच्चे के दिमाग पर इस लंभी अदालती लड़ाई और पिता के अमान्विय रवये का क्या असर हुआ होग
ये एक लाइन साहिर के पूरे बच्चमन की कहाणी कहे देती है।
ये सिर्फ कोई आम पारिवारिक जगडा नहीं था।
उनके पिता असल में उस क्रूर, सामन्ती और पित्र सतात्मक विवस्था का चेहरा बन गए थे,
जिसे साहिर ने ता उम्र नफ्रत की।
और आपको पता है यही नफ्रत आगे चल कर उनकी प्रगती शील और माक्सवादी विचार धारा का इंधन वनी।
यही से उन्होंने सत्ता और विवस्था के खिलाफ जम कर लिखना शुरु किया।
और यही बगावत हमें हमारे दूसरे पढ़ाव पर ले आती है।
लाहौर और राजनीतिक चेतना। चले देखते हैं कि कैसे लाहौर पहुंच कर उनकी सोच और उनकी शायरी ने एक नया आकार लिया।
यह कालक्रम मसल में उनके उस उथल पुथल भरे लिकिन सांस्क्रीतिक रूप से बहुत ही समरिद सफर को दिखाता है।
उन्नीस सो पेंतालीस में उनकी पहली उर्धू किताब आई तलखिया। तलखिया का मतलब ही होता है कड़वाहट। और इस किताब ने आते ही तहलका मचा दिया।
क्यों? क्योंकि इसमें प्यार की तडब भी थी और समाज की कड़वी सचाईयां भी। जैसे उनकी बहुत मशुरूर नजम ताज महल को ही ले लिजे। उन्होंने लिखा था एक शेहन शाह ने दौलत का सहारा लेकर हम घरीबों की मुहबत का उडाया है मजाक। उनकी श�
प्रग्रेसिव राइटर्स असोसियेशन यानी प्रगती शील लेखक संग ये एक सामराज्यवाद विरोधी और माक्सवादी विचारधारा वाला अंधूलन था। इसने साहिर को मजदूरों, किसानों और दबी कुछले लोगों की आवास बनने के लिए एक नई जुबा
प्रग्रेसिव राइटर्स असोसियेशन यानी प्रगती शील लेखक संग ये एक सामराज्यवाद विचारधारा वाला अंधूलन था। इसने साहिर को मजदूरों, किसानों और दबी कुछले लोगों की आवास बनने के लिए एक नई जुबा
आवास पर उपटियों के लिए जद यही जादुगर अपने शब्दों से पूरे देश पर एक ऐसा समोहन करने वाला था जिसका असर आज इतने सालों बाद भी कायम है।
चली देकते हैं कि फिल्मों में उनका शुरुवाती सफर कैसा रहा।
1949 में उनकी पहली फिल्म आये आंजादी की रह पर जो बुरी तरह फ्लौप रहे। किसी ने उने नूटिस नहीं किया।
लेकिन इसके तुरंत बाद आयी नौजवान और फिर बाजी जिनकी जबर्दस काम्याबी ने उने सीधा आसमान पर बिठा दिया।
यह काम्याबी दिग्गच संगीत कार स्डी बर्मन के साथ उनकी बे मिसाल जोड़ी का नतीजा थी।
1957 में गुरुदध की फिल्म प्यासा आयी। यह सिर्फ एक हिट फिल्म नहीं थी। यह भारतिय सिनिमा के इतिहास में एक बहुत बड़ा मील का पथर थी।
प्यासा में साहिर के गीत सिर्फ धुनों में फिट किये गए शब्ब नहीं थे। वो फिल्म की कहाणी को खुद आगे बढ़ा रहे थे। यह महलों, यह तख्टों, यह ताजों की दुनिया। यहां असल में शाईरी कहाणी चला रही थी। नकी कहाणी शाईरी को।
और इसी शौरत ने उन्हें वो ताकत दी, जिसका जिक्र हम अपने चोथे हिस्से में करेंगे। फिल्मी गीतकार की नई पहचान। साहिर अपने तीखे और अडियल कलातमक स्वभाव के लिए मशूर थे।
प्यासा की उस एतिहासे काम्याबी के बाद ही एक बहुत बड़ा टकराव देखने को मिला। स्डी बर्मन और साहिर के बीच बैहस चिर गई कि फिल्म की सफलता का असली क्रेडिट किसे जाता है। संगीत को या फिर शब्दों को। ये कोई चोटी बात नहीं थी। दो ब
साजिदारियां भी निभाईं। अम सरा इस एक रुपए पर गौर कीजे। हिंदुस्तानी सिनिमा के एतिहास में इस एक रुपए की बहुत एहमियत है। उस दोर में आक्टर्स और सिंगर्स को सुपरस्टार माना जाता था और गीतकारों को कोई खास थवा जो नहीं मिल
नाई थी। इसके चलते लटा जी और उनके बीच सालों तक बाचीद बंद रही।
लेकिन साहिर की इस एक जिद ने पूरी इंडॉस्ट्री में राइटर्स
का रुद्बा हमेशा के लिए बहुत उपर उठा दिया। चलीए अब आगे
बड़ते हैं अपने पाँच्वे हिस्सी की तरफ रिष्टे और उलज़ने।
क्योंकि उनकी जिन्दगी सिर्फ रिकॉर्डिंग स्टूडियो तक तो सिम्टी हुई है थी।
पक्के और प्रलीखित साक्षियों यानि एतियासिक रिकॉर्ड्स की बात करें, तो ये बिल्कुल साफ है
कि साहिर के जीवन में मशुरु लेखिका अमरिता प्रीतम और गायका सुधा
मल्होतरा के साथ उनके प्रेम संबंद रहे. अमरिता प्रीतम के साथ उनका रिष्टा
बीस्वी सदी के सबसे मशूर लेकिन साथ ही सबसे जटिल साहितिक प्रेम प्रसंगों में
गिना जाता है. ये ज्यादधर एक तरफा और दूरियों से भरा रिष्टा रहा.
एक तरफ सुधा मल्होतरा के साथ उनके रिष्टे का रंग कुछ अलर था, जहां साहिर ने
सुधा के गायन करियर को आगे बढ़ाने के लिए इंडॉस्ट्री में अपने रसूक का खुल कर
दिया था. उनका ये अडियल स्वभाव सिर्फ निजी रिष्टों में ही नहीं था. वो एक
ऐसे कालाकार थे, जिसने सिस्टम को अपने हिसाब से चलने पर मजबूर कर दिया.
सरः सोचिये, उस दौर में ओल इंडिया रेडियो पर जब गाने बचते थे, तो
सिर्फ गाया क्या गायका का नाम लिया जाता था. साहिर इस बात पर अड़ गए.
उनोंने लंबी लड़ाई लड़ी. और आखिर में रेडियो को मजबूर कर दिया, कि वो
बनाया गया है मेरे लिए. ये सिर्फ एक फिल्म का गाना नहीं है. ये एक
मुक्कमल नज्म है, जिसने करोडो लोगों के जसबातों
को एक आवाज देदी. आज इतने सालों बात भी इन गीटों का
जादू और इनकी गेहराई जस की तस महसूस होती है.
साहित्य और सिनमा को इतना कुछ देनी के बाद, पचीस अक्तूबर उन्नी सु असी को, महईज उनसर्ट साल की उम्र में दिल का दौरा पढ़ने से उनका अचानक निधन हो गया. उन्ने जुहू के मुस्लिम कबरिस्तान में दफनाया गया. इतनी जल्दी एक ऐसी बेबाक �
गया. और 1973 में अंतराश्ट्रिय स्थर पर सोवियत लैंड
नेहरू पुरसकार मिला. और फिर 2003 में उनके सम्मान
में जो समारक डाक्टिकेट जारी किया गया, वो इस बात
का पक्का सभूत है कि वक्त कुजरने के साथ उनकी एहमियत
गटी नहीं बलकि और बढ़ी है. तो इन सब बातों के
बाद अंत में ये एक बहुत बड़ा सवाल हमारे सामने
आकर ख़ड़ा हो जाता है. लाहोर की उन विद्रोही,
आग उगलती नजमों से लेकर बंबई के रुमानी और
गहरे फिलमी तराणों तक के उनकी इस पूरे सफर को देखें.
तो क्या साहिर लुध्यानवी ने कमेर्शल सिनेमा को
उठाकर क्लासिक साहित्य के दर्जे तक पहुंचा दिया?
या फिर क्या उन्होंने बंद कम्रों में पढ़े जाने वाले
उस क्लासिक साहित्य को आम आवाम की जुबान पर लाकर ख़ड़ा कर दिया?
शायद यही, यही साहिर लुध्यानवी का असली जादू है।
