کتابوں پر تبصرے · 9:51
दीवान-ए-ग़ालिब समीक्षा
Diwan-e-Ghalib: Ek Sameeksha
اس ویڈیو کے بارے میں
इस विस्तृत समीक्षा में हम नसीम अब्बासी द्वारा हिंदी में अनूदित 'दीवान-ए-ग़ालिब' की चर्चा करते हैं, जो हिंदी पाठकों के लिए ग़ालिब की जटिल शायरी की दुनिया के द्वार खोलती है। वीडियो की शुरुआत मानव अस्तित्व पर एक दार्शनिक सवाल से होती है, जिसे ग़ालिब की सोच से जोड़ा गया है। इसमें शेर, ग़ज़ल, रदीफ़, क़ाफ़िया और तख़ल्लुस जैसी उर्दू शायरी की मूल संरचना को सरलता से समझाया गया है। चुने हुए शेरों के माध्यम से ग़ालिब के अस्तित्ववादी विरोधाभास, प्रेम के दर्द और आनंद, तथा मृत्यु के अर्थ की व्याख्या की गई है। अनुवाद की शैली को उसकी स्पष्टता और सरलता के लिए सराहा गया है, हालांकि कुछ छोटी कमियों और अधिक सरलीकरण के जोखिम की भी चर्चा की गई है। वीडियो का समापन ग़ालिब की शायरी की प्रासंगिकता और अब्बासी के अनुवाद के महत्व पर विचार के साथ होता है।
- ◆नसीम अब्बासी का हिंदी अनुवाद ग़ालिब की शायरी को गैर-उर्दू पाठकों के लिए सुलभ बनाता है।
- ◆समीक्षा में शेर, ग़ज़ल, रदीफ़, क़ाफ़िया और तख़ल्लुस की काव्यात्मक संरचना समझाई गई है।
- ◆मुख्य विषयों में अस्तित्ववादी विरोधाभास, प्रेम का दर्द और आनंद, तथा मृत्यु शामिल हैं।
- ◆अब्बासी की शैली स्पष्ट है, पर कुछ छोटी गलतियों और अधिक सरलीकरण का जोखिम है।
- ◆यह अनुवाद छात्रों, शिक्षकों और ग़ालिब के दर्शन में रुचि रखने वालों के लिए उपयोगी है।
اس ویڈیو کے اشعار
नक़्श फ़र्यादी है किस की शोक़ी-ए-तहरीर काकाग़ज़ी है पैरहन हर पैकर-ए-तस्वीर का
naqsh faryadi hai kis ki shauq-e-tahreer kakagazi hai pairahan har paikar-e-tasveer ka
Every image is clothed in paper; the very act of creation is a complaint.
काव-कावे सरख़़-जानी-हाए-तन्हाई न पूछसुबह करना शाम का लाना है जू-ए-शीर का
kav-kave sarkh-jani-ha-e-tanhai na poochsubah karna shaam ka lana hai ju-e-sheer ka
Passing the night in loneliness is as hard as bringing a stream of milk.
इश्क़ से तबीयत ने ज़ीस्त का मज़ा पायादर्द की दवा पाई, दर्द-ए-बे-दवा पाया
ishq se tabiyat ne zeest ka maza payadard ki dawa payi, dard-e-be-dawa paya
Love gives life meaning, but also brings an incurable pain.
ठाँपा कफ़न ने दाग़-ए-उयूब-ए-बरहनगीमैं वर्ना हर लिबास में नंग-ए-वुजूद था
thampa kafan ne daag-e-uyub-e-barhangimain warna har libas mein nang-e-wujood tha
Only the shroud covers the flaws of naked existence.
थी नौ-आमोज़-ए-फ़ना हिम्मत-ए-दुशवार-पसंदसख़्त मुश्किल है कि ये काम भी आसाँ निकला
thi nau-amoz-e-fana himmat-e-dushwar-pasandsakht mushkil hai ke ye kaam bhi aasan nikla
Even the hardest task, like embracing annihilation, turned out to be easy.
दहर में नक़्श-ए-वफ़ा वजह-ए-तसल्ली न हुआहै ये वो लफ़्ज़ कि शर्मिंदा-ए-मा'नी न हुआ
dahr mein naqsh-e-wafa wajah-e-tasalli na huahai ye vo lafz ke sharminda-e-ma'ni na hua
The word 'faithfulness' never lived up to its meaning in the world.
ٹرانسکرپٹ پڑھیں
क्या मानवस्तित्व यानि हमारा इस दुनिया में होना ही अपने आप में एक विरोध हैं?
क्या हमारा महज़ वजूद में आना ही एक तरह की शिकायत हैं?
सोचने वाली बात है, है ना?
ये एक बेहत गहरा दार्शनिक सवार है,
जिसे उर्दू शायरी के एक महान उस्ताद ने बरसों पहले उठाया था.
आज के इस विस्त्रित विशलेशन में,
हम एक ऐसी खास किताब के जरीए इस रहस्यों को सुलझाने वाले हैं,
जो सदियों पुरानी शायरी को आज के दौर में भी बिल्कुल जिन्दा और प्रासंगिक बना देती हैं.
मिर्जा गालिब का नाम तो यकीनन हम सब ने सुनाये,
लेकिन सच कहें तो, उनकी शायरी अक्सर एक बेहत खुबसूरत,
पर अंदर से पूरी तरह लॉक किये गए दर्वाजे की तरह लगती है.
मिसाल के दौर पर इन शुरुवाती पंक्तियों को ही ले लीजे,
नक्ष फर्यादी है किस की शोक ही है तहरीर का?
ये अलफास सुनने में सच में बहुत जादूई लगते हैं,
लेकिन आज के दौर में इन्हे पढ़ने वालों के लिए इनके असली माइने समझना किसी बड़ी चनौती से कम नहीं है,
आखिर बिना सही चावी के गालिब का ये जादूई दर्वाजा इतनी आसानी से थोड़ी खुलता है.
तो चलिए इस ताले की चावी ढूंढते हैं. आज हम जिस किताब की बात कर रहे हैं, वो है नसीम अबबासी जी द्वारा 2009 में प्रकाशत दिवाने गालिब का हिंदी संसकरण.
असल में ये किताब महज़ शेरो का कोई साधारन संग्रह नहीं है. ये तो उस बंद दर्वाजे की वो चावी है, जो गालिब की इस गूड और मुश्किल सी लगने वाली दुनिया को बहुती आसान और सुलझेवे तलीके से हमारे सामने खोल कर रख देती है.
अब शुरुवात करते हैं इसके पहले भाग से, यानि कावियातमक संरचना और अनुवाद की रूपरेखा. आखिर इस शायरी की बुनियाद कैसे रची गई है?
तो सबसे पहले इस शायरी की बुनियादी बनावड को समझना बहुत जरूरी है. आखिर अबबासी जी के साचे का अनुवाद कर रहे हैं. कविता की गहरे आर्थ तक पहुचने से पहले उसकी नीव को समझना एकदम आवशक है. गालिब की दुनिया में कदम रखने से प
चोटे से साचे में एक बहुत बड़ी वैचारिक दुनिया खड़ी कर देते हैं.
यहीं पर गजल की तक्नीकी रीड को समझना बहुत दिल्चस्प हो जाता है.
जैसे रदीव यानि वो शब्द जो आखर में बार-बार दोहराय जाता है,
काफिया, जो रदीव से ठीक पहली की तुक-बंदी है, और तखल्लुस, जो शायर का अपना उपनाम होता है.
नसीम अबासी जी की ये किताब, हिंदी लिपी में पढ़ने वालों के लिए इन सन्रश्नात्मक तत्मों को बहुती बारीकी से समझाती है.
इससे होता ही है कि अलग-अलग दिखने वाले शेरों के बीच्छीपी हुई एक सुरीली कूंच का बहुती खुबसूरती से हईसास होता है.
अब बढ़ते हैं दूसरे भाग की तरफ. अस्तित्व एक विरोध है. यहां हम एक बिल्कुल अलग दार्शनिक द्रिश्टी कोण पर चर्चा करेंगे.
चलिए अब अपने पहले मुख्य विशय पर आते हैं. यह देखना दिल्चस्प है कि कैसे गालिब हमारे अस्तित्व को यानि हमारी पैदाईश को ही एक शिकायत के रूप में पेश करते हैं. हम वापिस उसी शिरुआती शेर पर आते हैं ताकि इस बार इसका अर्थ थो�
और यहीं पर नसीम अबासी जी की एक बहुती बहतरीन पदद थी यानि विचारों से पहले शब्दों के अर्थ बताने की काला काम आती हैं.
वो सबसे पहले फार्सी के उन भारी भर्कम शब्दों को अलग करते हैं, फर्यादी जिसका अर्थ है शिकायत करता, पेरहन जिसका अर्थ है कपड़े और पैकरे तस्वीर यानि उकेरा गया चित्र या आकरती. इन शब्दों का सीधा सा अर्थ हमें बताता है कि कागस पर
काजी सैयूदीन की एक गहरी दार्शनिक व्याक्या भी सामने रखी गई है, जिसके अनुसार हर जीव का पैदा होना ही विधाता से एक पीड़ा दायक शिकायत है.
गालिब सिर्फ दो पंक्तियों के भीतर दर्शन और नयाय का एक पूरा दर्बार ख़ड़ा कर देते हैं और अबासी जी का ये अनुवाद इन दोनों ही पहलूं को बहुती खुपसूर्थी से उजागर करता है.
आईए अब तीसरे भाग के ओर चलते हैं. प्रेम का विरोधा भाज. इश्क को यहां एक असंभव संगर्श के रूप में दिखाये गया है. अब इश्क और प्रेम के एक अलग ही पहलूं पर बात करते हैं.
यह देखना वाकई हैरान करने वाला है कि कालिब प्यार को किसी आराम या सुकून की तरह बिल्कुल नहीं देखते. बल्कि वो इसे एक बेहत ठका देने वाले असंभव संगर्श की तरह देखते हैं.
अब इस खुब्सूरश शेर को ही देख लीज़े. काव कावे सक्त जानी हाई तनहाई न पूच। सुभा करना शाम का, लाना है जुएशीर का। यह पंगतियां दिखाती हैं कि कैसे तनहाई में गुजारा गया वक्त और बस शाम से सुभा हुने के अंतजार करना एक बह
समझाते हैं। वे यहां फर्हाद और शीरी की उस मशूर लोग कथा का भी संधर्ब देते हैं जहां फर्हाद अपनी प्रेमीका के
सचमे पहाड काट कर दूद की नहर निकालता है। इस तरह आशिक का सिर्फ इंतजार करना भी पहाड तोड़ने जितने भारी श्रम के बराबर बताये गया है।
चलिए, अब इस अगले शेर को देखते हैं। इश्क से तबियत ने जीस्त का मजा पाया, दर्द की दवा पाई, दर्दे भी दवा पाया।
यहाँ प्यार की दोहरी भूमेका पर बहुत सोर दिया गया है। देखा जाये तो प्यार जीवन के खालीपन को दूर तो जरूर करता है, लेकिन साथ ही वो खुद एक ऐसा नया दर्द बन जाता है जिसका कोई एलाज ही नहीं है।
मानों ये एक ऐसी बिमारी है जो खुद अपनी ही लाज से पैदा होती है। है ना कमाल की बात। तो यहां सबसे एहम बात ये निकल कर आती है कि गालिब की कविता इसी विरोधभास की इंजन पर चलती है। इशक दर्द की दवा भी है और दर्दे बेदवा यानी एक ला
इसमें हम इंसान होने की नयतिकता पर गौर करेंगे। ये सारा दर्द और विरोधभास हमें जीवन के सबसे गहरे सवालों की और ले जाता है।
पहचान, हमारी कमिया और मृत्यों के सामने इंसान होने की आखिर क्या हेमियत है। इस शेर को बढ़ते हैं। धापा कफन ने दागे यूबे बरहनगी। मै वर्णा हर लिबास में नंगे वुजूद था। ये सच में एक बहुती विचलित करने वाला और गहरा विचार ह
और बरहनगी यानी नगनता। हम इस समाज में चाहे जो भी रुत्बा हासिल कर लें, कितने भी अच्छे कपड़े पहन लें, वो सब बस अस्थाई हैं। हम आखिर कार अतने वजूद में नंगे ही रहते हैं। इनसान का सबसे आखरी और सच्चा परदा सिर्फ और सिर्�
जिससे हमेशा से ही मुश्किल काम पसंद थे, उसके लिए आखिर कार मरने का काम भी बहुत ही आसान साबित हुआ।
यहां जो बात सबसे खास उभरकार आती है, वो है फना शब्द की गहराई। अगर हम इसका सिर्फ शाब्दिक अर्थ लें, तो यह शारीरिक मिर्त्यू है।
लेकिन अगर सूफी परमपरा की बात करें, तो इसका मतलब एहंकार का पूरी तरह से मिड़ जाना है। अब बासी जी की टिपनी यहां बहुत गुनजाईश छोड़ती है, जिससे इस शेर को सिर्फ किसी एक आसान अर्थ में बानना मुमकिन नहीं रहता। और सबसे अच
आज के पाठकों के लिए काम की है? इस किताब का असल मुल्य क्या है? चलिए, इसका एक मिश्पक्ष मुल्यांकन करते हैं।
अगर इस किताब की खूबियों की बात करें, तो यह हिंदी में बहुत ही सुलब और आसान अनुवाद पेश करती है, कई सारे अलग-अलग अर्थों को स्वीकार करती है, और विचारों में उलजने से पहले शब्दों को सीधे तौर पर समझाती है।
लेकिन हाँ, कुछ कमियाँ भी हैं, जैसे कुछ जगाओं पर प्रिंटिंग या स्पेलिंग की थोड़ी बहुत गल्तियां देखने को मिलती हैं, और इसका सबसे बाड़ा खतरा यह है कि यह गालिब की जतिल शायरी को एक पूरी तरह से सुलजीवी पहिली के तरह पेश क
और हाँ, उन सभी के लिए जो घालिब की व्याक्या करने वाली इस महान एतिहासी परंपरा का हिस्सा बनना चाहते हैं, कुल मिला कर यह अनुवाद उनके लिए एक बहुती शांदार शुरुवाद है।
इस पूरे विशलेशन को समेटते हुए आखर में जराएँ इस शेर पर ध्यान देते हैं।
दहर में नकशे वफा वजहे तसली न हुआ है यह वो लव्ज के शर्मिंदाय मानी न हुआ।
यहां वफा, यानी वफदाली का जिक्र किया गया है।
गालिब कह रहे हैं कि वफा सिर्फ एक ऐसा शब्द बन कर रह गया है जिसका हकीकत से या उसके असली अर्थ से आप कोई लेना देना ही नहीं है।
और यह शांदार शेर हमें आज के इस विशलेशन के आखरी और सबसे उकसाने वाले सवाल पर ले आता है।
क्या हमारी भाशा, हमारी शब्द, कभी भी हमारी सबसे गहरी वफाधारियों को सच में बया कर सकते हैं?
या फिर हम सिर्फ ऐसे शब्दों का इस्तमाल कर रहे हैं जो खुद अपनी ही अर्थों के लिए बिलकुल आजनवी बन चुके हैं।
इस सवाल के साथ ये बात तो तैह है कि गालिब की शैरी की ये अथा गहराई हर किसी को इसमें और डूबने के लिए मजबूर कर ही देगी।
