शब्दार्थ

रखूँ

rakhūñ

hiverb

अर्थ

रखूँ, मानूँ या संजोऊँ।

विस्तार

शास्त्रीय शायरी में 'रखना' क्रिया का यह उत्तम पुरुष संभाव्य रूप किसी भाव, वस्तु या स्थिति को दिल में संजोने अथवा मानने को दर्शाता है। प्रस्तुत शेर में यह 'अज़ीज़ रखना' (अतिप्रिय समझना) के मुहावरेदार रूप में प्रयुक्त हुआ है, जहाँ आशिक़ अपनी जान को माशूक़ से बढ़कर प्रिय समझने से साफ़ इनकार करता है। यह प्रेमी के पूर्ण समर्पण और आत्म-त्याग की भावना को उजागर करता है।

व्युत्पत्ति

From Sanskrit 'रक्षति' (rakṣati, to guard, protect, keep), passing through Prakrit 'रक्खइ' (rakkhai) into Hindustani 'रखना' (rakhnā).

प्रयोग

Frequently used in the subjunctive mood to frame rhetorical questions regarding romantic hesitation, ethical choice, or ultimate devotion in ghazals.

उदाहरण

दिल में छुपा के कैसे रखूँ दर्द-ए-आरज़ू

उम्मीद रखूँ या कि फ़क़त सब्र इख़्तियार करूँ

समानार्थी

संजोऊँमानूँसँभालूँ

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