शब्दार्थ
मुस्तग़नी
mustaghni
अर्थ
बेपरवाह, बेनियाज़, स्वतंत्र, जिसे किसी चीज़ की चाह न हो।
विस्तार
शास्त्रीय उर्दू शायरी में 'मुस्तग़नी' का आशय ऐसे अस्तित्व या भाव से है जो तृप्त, बेनियाज़ और हर प्रकार की ज़रूरत से परे हो। इस शेर में यह 'फ़ैज़-ए-इश्क़' की उस बेपरवाह और सर्वोच्च स्थिति को दर्शाता है जो किसी याचना की मोहताज नहीं है। यह शब्द सूफ़ी परंपरा में सांसारिक मोह-माया से पूर्ण विरक्ति के लिए भी प्रयुक्त होता है।
व्युत्पत्ति
Arabic, derived from the root غ-ن-ي (gh-n-y), form X active participle (mustaghni), denoting someone who considers themselves free from want or need.
प्रयोग
In the ghazal tradition, 'mustaghni' is frequently attributed to the beloved or God to highlight their regal indifference toward the lover's suffering.
उदाहरण
दिल-ए-मुस्तग़नी को किसी के करम की तमन्ना नहीं
हर चाह से मुस्तग़नी होकर फ़क़ीरी अपना ली
