है मक़ाम-ए-ज़िंदगी ज़ेर-ए-दम-ए-शमशीर-ए-मर्ग — शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

है मक़ाम-ए-ज़िंदगी ज़ेर-ए-दम-ए-शमशीर-ए-मर्ग हो गया जिस तरह कोई दम गुज़ारा हो गया

“Life's dwelling lies beneath the edge of death's drawn sword; whatever breath you pass has, somehow, passed away.”

— शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

अर्थ

ज़िंदगी का ठिकाना मौत की तलवार की धार के नीचे है; जैसे भी कोई एक पल गुज़र जाए, वही गुज़ारा समझो।

विस्तार

यह शेर जीवन को बहुत नाज़ुक चीज़ के रूप में दिखाता है, जो मौत की तलवार की धार के ठीक नीचे बीतता है। हर पल जब हम जीते हैं, मौत हमारे ऊपर मंडराती रहती है, गिरने को तैयार। शायर कहते हैं कि जैसे-तैसे, किसी भी तरह, हम बस अपने दिन गुज़ार देते हैं। इसमें एक शांत स्वीकार है। हम जीवन पर पूरा काबू नहीं रखते, बस हर साँस को जितना बन पड़े उतना बिता लेते हैं, यह जानते हुए कि वह किसी भी क्षण ख़त्म हो सकती है। यह याद दिलाता है कि समय कितना बहुमूल्य और अनिश्चित है, और लोग उस साए के नीचे कितनी हिम्मत से साँस दर साँस आगे बढ़ते रहते हैं।

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