जो कुछ कि हुआ हम से वो किस तरह न होता — शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

जो कुछ कि हुआ हम से वो किस तरह न होता हुक्म-ए-अज़ली ज़ौक़ यूँहीं हो ही चुका था

“Whatever came to pass through me, how could it not have been? The writ of fate, O Zauq, was thus already set in stone.”

— शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

अर्थ

हमसे जो कुछ भी हुआ, वह भला कैसे न होता? ऐ ज़ौक़, यह तो तक़दीर का हुक्म था जो पहले ही से यूँ तय हो चुका था।

विस्तार

इस शेर में ज़ौक़ बड़ी नरमी से तक़दीर को स्वीकार करते हैं। वे कहते हैं, जो कुछ भी मुझसे हुआ, वह भला और किस तरह होता? वह तो हमेशा से ऐसा ही होना था। जो फ़ैसला सृष्टि के आरंभ से पहले ही लिख दिया गया था, वह तो बहुत पहले ही तय हो चुका था। फिर क्यों खुद को या किसी और को दोष दें? कोई दूसरा रास्ता था ही नहीं। इस शेर में भाग्य के आगे एक कोमल समर्पण है। यह मन को शांति देता है, पछतावे और अपराध-बोध से मुक्त करता है, यह भरोसा देकर कि ज़िंदगी ठीक वैसे ही चली जैसे लिखी गई थी।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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