हो सीन न तमीज़ आई ख़ोरी ओ बुज़ुर्गी की शागिर्द हुआ तो क्या उस्ताद हुआ तो क्या

“When years bring no discernment between the humble and the great, what matters if one is a disciple or a master of high estate?”

— शाह तुराब अली क़लंदर
अर्थ

अगर उम्र बीत जाने पर भी छोटे और बड़े अथवा अदने और आला की पहचान न आई, तो इंसान चाहे शागिर्द बना रहे या उस्ताद, इसका कोई फ़ायदा नहीं है।

विस्तार

यह शेर हमें समझाता है कि उम्र बढ़ जाने या कोई बड़ा रुतबा पा लेने से इंसान सच में समझदार नहीं बन जाता। अगर किसी के भीतर अपनी छोटी गलतियों को समझने की विनम्रता और सच्चे बड़प्पन का फर्क़ पहचानने की तमीज़ ही न आए, तो उसका 'शागिर्द' होना या 'उस्ताद' बन जाना दोनों बेकार हैं। असली परिपक्वता कागज़ी ओहदों से नहीं, बल्कि इंसान के अदब, समझदारी और उसकी नीयत से तय होती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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